गुरु ग्रंथ साहिब 585 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji
1सतगुरु उसके मन में से माया का भृम दूर कर देता है और फिर वह सत्य-नाम में समाया रहता है।
2सत्य-नाम में समाकर वह भगवान का गुणगान करता रहता है और अपने प्रियतम प्रभु से मिलकर सुख प्राप्त करता है।
3वह दिन-रात हमेशा ही आनंद में रहता है और उसके हृदय से अहंत्व दूर हो जाता है।
4जिन महापुरुषों ने हरि के नाम को अपने चित्त से लगाया है, मैं उनके चरण स्पर्श करता हूँ।
5यदि सतिगुरु अपने साथ मिला लें, तो यह शरीर स्वर्ण की भाँति पावन हो जाता है॥ २॥
6यदि सतगुरु सूझ प्रदान करें तो ही उस सच्चे प्रभु का स्तुतिगान किया जाता है।
7सच्चे गुरु के बिना जो जीव-स्त्रियों भृम में मूली हुई हैं, वे आगे जाकर परलोक में क्या मुंह दिखाएँगी ?
8वे परलोक में क्या मुंह दिखाएँगी, वे अपने अवगुणों के कारण पछताती हैं और दुःख ही भोगती हैं।
9लेकिन जो जीव-स्त्रियाँ नाम में मग्न रहती हैं, उनका गहरा लाल रंग हो जाता है और वे अपने पति-परमेश्वर की गोद में विलीन हो जाती हैं।
10मुझे परमात्मा जैसा महान् अन्य कोई नहीं दिखाई देता। फिर मैं अपना दुःख किसके समक्ष जाकर कहूँ?
11यदि सतगुरु सूझ प्रदान करें तो उस परम-सत्य का स्तुतिगान किया जाता है॥ ३॥
12जिन्होंने सच्चे परमात्मा की प्रशंसा की है, मैं उनके चरण स्पर्श करता हूँ।
13ऐसे मनुष्य सत्यवादी एवं निर्मल होते हैं और उन्हें मिलकर मन की अहंकार रूपी मैल दूर हो जाती है।
14उनको मिलकर अहंकार रूपी मैल निवृत्त हो जाती है और मनुष्य सत्यनाम के सच्चे सरोवर में स्नान करता है और सहज स्वभाव ही सत्यवादी बन जाता है।
15सतिगुरु ने मुझे अगम्य, अगोचर एवं मायातीत प्रभु-नाम का भेद बता दिया है।
16नानक का कथन है कि प्रेम-रंग में लीन हुए जो रात-दिन प्रभु-भक्ति करते हैं, वे सत्य में समा जाते हैं।
17जिन्होंने परम-सत्य ईश्वर का ध्यान केिया है, मैं उनके चरण स्पर्श करता हूँ॥ ४॥ ४॥
18वडहंस की वार महला ४ ललां बहलीमा की धुनि गावणी
19ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
20श्लोक महला ३॥
21जो लोग शब्द में मग्न हैं, वही परमहंस (परमार्थी) हैं और उन्होंने सत्यनाम को अपने हृदय में बसा कर रखा हुआ है।
22वे सत्य को संचित करते हैं, सत्य में लीन रहते हैं और सत्य नाम से ही प्रेम करते हैं।
23करतार ने उन पर यह दया-दृष्टि की हुई है कि वे हमेशा पावन रहते हैं और उन्हें कोई मैल नहीं लगती।
24हे नानक ! मैं उन महापुरुषों पर कुर्बान जाता हूँ, जो निशदिन प्रभु का जाप करते हैं।॥ १॥
25महला ३॥
26मैं यह जानती थी कि वह कोई परमहंस (परमार्थी) है, तभी मैंने उसकी संगति की।
27यदि यह समझती कि बेचारा बगुला अर्थात् कोई ढोंगी है तो जन्म से ही उससे मिलाप न करती ॥ २ ॥
28महला ३॥
29हंसों (परमार्थियों) को तैरते देखकर बगुलों (ढोंगियों) को भी तैरने की तीव्र लालसा उत्पन्न हुई है।
30लेकिन बेचारे बगुले तो भवसागर में डूबकर प्राण त्याग गए. उनके सिर नीचे एवं पैर ऊपर थे॥ ३॥
31पउड़ी॥
32हे परमपिता ! तू स्वयंभू, सर्वशक्तिमान है और तूने स्वयं ही संसार बनाया है।
33तू स्वयं ही निराकार है और तेरे सिवाय अन्य कोई दूसरा नहीं।
34तू ही करने एवं कराने में समर्थ है एवं जो तू करता है, वही होता है।
35तू ही सब जीवों को बिना मॉगे हुए दान प्रदान करता है।
36सभी बोलो-सतिगुरु धन्य-धन्य हैं, जिसने हरि-नाम का दान हम जीवों के मुख में दिया हुआ है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं