सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 581 · Raag Vadhans · Guru Nanak Dev Ji

1मैं ठगी हुई पत्नी सांसारिक कार्यों के पीछे भाग रही हूँ। मैं विधवा वाले अशुभ कर्म करती हूँ और पति ने मुझे त्याग दिया है।

2प्रत्येक घर में पति-परमेश्वर की स्त्रियाँ हैं। सच्ची स्त्रियाँ अपने सुन्दर पति के साथ स्नेह एवं प्रेम करती है।

3मैं अपने सच्चे पति-परमेश्वर की महिमा-स्तुति करती हूँ और अपने स्वामी के नाम द्वारा ही प्रसन्न होती हूँ॥ ७ ॥

4गुरु को मिलने से जीवात्मा की वेशभूषा बदल जाती है अर्थात् जीवन संवर जाता है और वह सत्य से अपने आपको श्रृंगार लेती है।

5हे मेरी सखियो ! आओ, हम मिलकर सृजनहार प्रभु को याद करें।

6प्रभु-पति के नाम द्वारा जीव-स्त्री अपने स्वामी की सुहागिन बन जाती है और सत्यनाम उसको सुन्दर बनाने वाला है।

7इसलिए विरह के गीत मत गायन करो अपितु हे नानक ! ब्रह्म का चिन्तन करो।॥८॥३॥

8वडहंसु महला १ ॥

9जो जगत की रचना करके स्वयं भी उसमें ही समाया हुआ है, वह मालिक अपनी कुदरत से ही जाना जाता है।

10सत्यस्वरूप परमेश्वर को कहीं दूर नहीं खोजना चाहिए, क्योंकि वह तो प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, इसलिए अपने हृदय में ही शब्द रूप में पहचानो।

11जिसने यह सृष्टि-रचना की है, उसे सच्चे परमेश्वर को सच्चे शब्द द्वारा पहचानो एवं उसे दूर मत समझो।

12जब मनुष्य परमात्मा के नाम का ध्यान-मनन करता है तो वह सुख प्राप्त करता है, अन्यथा नाम के बिना वह पराजित होने वाली जीवन खेल खेलता है।

13जो सृष्टि की रचना करता है, वही इसे आधार देने की विधि जानता है। कोई क्या कथन एवं वर्णन कर सकता है।

14जिसने संसार की रचना करके उस पर मोह-माया का जाल डाला हुआ है, उसे ही अपना मालिक मानना चाहिए॥ १ ॥

15हे बाबा ! जो भी जीव दुनिया में आया है, उसने अवश्य ही उठकर चले जाना है। यह दुनिया एक बीच का आधा पड़ाव है अर्थात् जन्म-मरण का चक्र है।

16जीवों के पूर्व जन्म के शुभाशुभ कर्मो का विचार करके परमात्मा उनके मस्तक पर दुःख-सुख की तकदीर लिख देता है।

17जीवों के किए हुए कर्मों के फलस्वरूप परमेश्वर दुःख-सुख प्रदान करता है और वे जीव के साथ रहते हैं।

18कर्ता-प्रभु जैसे कर्म जीवों से करवाता है, वह वैसे ही कर्म करते हैं और वे किसी अन्य कार्य की तलाश भी नहीं करते।

19परमेश्वर स्वयं तो दुनिया से निर्लिप्त है किन्तु दुनिया मोह-माया के बंधनों में फँसी हुई है। अपने हुक्म अनुसार ही वह जीवों को मुक्ति प्रदान करता है।

20जीव द्वैतभाव से जुड़कर पाप करता रहता है और परमात्मा के सिमरन को आज अथवा कल को करने का टालते-टालते आयु निकल जाती है और मृत्यु आकर घेर लेती है॥ २॥

21मृत्यु का मार्ग बड़ा निर्जन एवं घोर अन्धेरे वाला है और जीव को मार्ग दिखाई नहीं देता।

22वहाँ न तो जल मिलता है, न ही विश्राम के लिए ओढ़ने हेतु चादर एवं तोशक और न ही विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन पदार्थ खाने को मिलते हैं।

23वहाँ जीव को न ही भोजन, शीतल जल मिलता है और न ही वस्त्र एवं श्रृंगार पदार्थ मिलते हैं।

24वहाँ जीव की गर्दन जंजीर से जकड़ी जाती है, यमदूत सिर पर खड़ा होकर उसे मारता है और वहाँ कोई भी घर बार सुख का स्थान बचने के लिए नहीं मिलता।

25इस मार्ग के बोए हुए बीज नहीं फलते अर्थात् सभी प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। जीव पापों का बोझ अपने सिर पर उठाकर पश्चाताप करता है।

26केवल यही सच्चा विचार है कि सच्चे परमेश्वर के बिना मनुष्य का कोई भी सज्जन नहीं ॥ ३॥

27हे बाबा ! वास्तव में वैरागी होकर वही रोते एवं विलाप करते समझे जाते हैं, जो मिलकर प्रभु का यशोगान करते हुए अक्षु बहाते हैं।

28मोह-माया के ठगे हुए एवं अपने सांसारिक कार्यों की खातिर रोने वाले रोते ही रहते हैं।

29वे सांसारिक कार्यों हेतु रोते हैं और अपनी विकारों की मैल को नहीं धोते। उन्हें यह नहीं पता कि यह संसार तो एक स्वप्न की भाँति है।

30जैसे बाजीगर भ्रम भरी खेल में भूल जाता है, वैसे ही मनुष्य झूठ एवं कपट के अहंकार में ग्रस्त हैं।

31परमात्मा स्वयं ही सन्मार्ग प्रदान करता है और स्वयं ही कर्म कराने वाला है।

32हे नानक ! जो व्यक्ति परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं, पूर्ण गुरु उनकी सहज-स्वभाव रक्षा करता है॥ ४॥ ४॥

33वडहंसु महला १ ॥

34हे बाबा ! जो कोई भी इस दुनिया में जन्म लेकर आया है, उसने एक दिन अवश्य ही यहाँ से चले जाना है, चूंकि यह क्षणभंगुर दुनिया तो झूठ का प्रसार है।

35सच्चे परमेश्वर की भक्ति करने से ही सच्चा घर मिलता है और सत्यवादी होने से सत्य मिल जाता है।

36झुठ एवं लालच के द्वारा मनुष्य स्वीकृत नहीं होता और उसे परलोक में भी शरण नहीं मिलती।

37उसे भीतर आने के लिए कोई नहीं कहता अर्थात् कोई भी उसका स्वागत नहीं करता: अपितु वह तो सूने घर में कौए की भाँति है।

38मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में फँसकर प्रभु से लम्बे समय के लिए बिछुड़ जाता है। इसी तरह ही सारा संसार नष्ट हो रहा है।

39लालच में माया के प्रपंच ने जगत को भुलाया हुआ है और काल (मृत्यु) सिर-पर खड़ा होकर दुनिया को रुला रहा है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं