गुरु ग्रंथ साहिब 57 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1सत्य प्रभु के नाम द्वारा वह उसे पहचान लेते हैं, जो पाताल, धरती एवं आकाश तीनों लोकों में रहता है॥ ५॥
2वह जीव-स्त्री बहुत ही सुन्दर है जिसने अपने प्रियतम-प्रभु को समझ लिया है, जो सदैव इसके साथ रहता है।
3दसम द्वार रूपी महल में रहने वाला प्रियतम प्रभु जीव-स्त्री को अपने महल में आमन्त्रित कर लेता है। पति उसे बड़ी प्रीति से रखता है।
4वही नारी सचमुच प्रसन्न तथा गुणवान सुहागिन है, जो अपने प्रियतम पति के गुणों पर मोहित होती है II६॥
5मुझ नाम से भूली हुई को गुरु के बिना नाम की सूझ नहीं होगी।
6चाहे मैं सारी घरती पर फिरती रहूँ, धरती पर घूमने के पश्चात पर्वतों पर चढ़ जाऊँ और जंगलों में भटकती रहूँ।
7यदि हरेि नाम को विस्मृत करके मैं भटकती रहूँ तो मैं पुनः पुनः आवागमन के चक्र में रहूँगी ॥७॥
8हे जीव-स्त्री ! जाकर उन पथिकों से पता कर लो जो प्रभु के भक्त होकर उसके मार्ग पर चलते हैं।
9वह ईश्वर को अपना सम्राट मानते हैं और उनको प्रभु के दरबार एवं घर में जाते समय कोई भी रोक नहीं होती।
10हे नानक ! एक परमेश्वर ही सर्वव्यापक है, इसके अलावा अन्य कोई भी अस्तित्व में नहीं Il८ II ६ II
11श्रीरागु महला १ ॥
12जब गुरु द्वारा मनुष्य का शरीर एवं मन निर्मल हो जाते हैं तो निर्मल प्रभु को जाना जाता है।
13सत्य निर्मल प्रभु मन में आ बसता है। वह परमेश्वर जीव के ह्रदय की पीड़ा को अनुभव करता है।
14सहज अवस्था प्राप्त होने पर मन बहुत सुखी होता है और काल (मृत्यु) का बाण उसे नहीं लगता ॥ १॥
15हे भाई ! हरि नाम के निर्मल जल में स्नान करने से तुझे कोई भी मलिनता नहीं लगी रहेगी, अपितु तेरे समस्त अवगुणों की मैल उतर जाएगी।
16हे प्रभु ! एकमात्र तू ही सत्य और निर्मल है, अन्य समस्त स्थानों पर मैल विद्यमान है॥ १॥ रहाउ॥
17यह जगत् ईश्वर का अति सुन्दर महल है। सृजनहार प्रभु ने स्वयं इसकी रचना की है।
18सूर्य एवं चंद्रमा की ज्योतियों की चमक अनूप है। ईश्वर का अनन्त प्रकाश तीनों ही लोकों में प्रज्वलित हो रहा है।
19तन के अन्दर दुकानें, नगर तथा किले विद्यमान हैं। जहाँ पर व्यापार करने के लिए नाम सत्य का सौदा है॥ २॥
20ज्ञान का सुरमा भय को नाश करने वाला है और प्रेम के द्वारा ही पवित्र प्रभु के दर्शन किए जाते हैं।
21प्राणी अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष समूह को जान लेता है, यदि वह अपने मन को एक स्थान पर केन्द्रित रखे।
22यदि मनुष्य को ऐसा सतिगुरु मिल जाए तो वह सहज ही उसको प्रभु से मिला देता है ॥३॥
23जैसे सोने को परखने के लिए कसौटी पर परख लिया जाता है, वैसे ही पारब्रह्म अपने उत्पन्न किए हुए प्राणियों के आत्मिक जीवन को बड़े प्रेम से ध्यान लगाकर परखता है।
24गुणहीन मंदे जीवों को स्थान नहीं मिलता और गुणवान वास्तविक कोष में डाले जाते हैं।
25अपनी आशा एवं चिन्ता को निवृत कर दे, इस तरह तेरी मलिनता धुल जाएगी॥ ४॥
26प्रत्येक व्यक्ति सुख की कामना करता है, कोई भी दुख की याचना नहीं करता।
27रसों-स्वादों के पीछे अत्यंत कष्ट प्राप्त होता है परन्तु मनमुखी प्राणी इसको नहीं समझते।
28जो सुख और दुख को एक समान जानते हैं और अपनी आत्मा को नाम के साथ अभेद करते हैं, वह ईश्वरीय सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं ॥ ५॥
29ब्रह्मा के वेद तथा व्यास के शब्दों के पाठ पुकारते हैं कि
30मौनधारी ऋषि, प्रभु के भक्त एवं साधक गुणों के भण्डार नाम के साथ रंगे हुए हैं।
31जो सत्यनाम के साथ रंग जाते हैं, वे सदैव विजय प्राप्त करते हैं। मैं उन पर सदैव ही बलिहारी जाता हूँ ॥६॥
32जिनके मुख में प्रभु का नाम नहीं, वे मैल से भरे रहते हैं और चारों ही युगों में मैले रहते हैं।
33जो भगवान से प्रेम नहीं करते उन भक्तिहीनों का भगवान के दरबार में मुँह काला किया जाता है और वे अपना मान-सम्मान गंवा लेते हैं।
34जिन्होंने भगवान के नाम को विस्मृत कर दिया है, उन्हें उनके अवगुणों ने ठग लिया है, इसलिए वे विलाप करते हैं।॥७॥
35भगवान खोज करने से मिल जाता है। जब मनुष्य के मन में भगवान का भय पैदा हो जाता है फिर गुरु के द्वारा उसे भगवान मिल जाता है।
36जीवात्मा का स्वरूप ज्योति है। जब जीवात्मा को अपने ज्योति स्वरूप की पहचान हो जाती है तो वह अपने दसम द्वार रूपी घर में जाकर बसती है।
37उसकी अहंकार एवं तृष्णा मिट जाती है। हे नानक ! जो व्यक्ति भगवान के नाम में मग्न रहते हैं, वे निर्मल हो जाते हैं और उनके मुख भी उज्ज्वल हो जाते हैं।॥८॥७॥
38श्रीरागु महला १ ॥
39हे मेरे भूले बावले मन ! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुन। तू गुरु के चरणों में जाकर लग।
40तू ईश्वर का नाम जप और भगवान का ध्यान किया कर, नाम से यमदूत भी भयभीत होता है और समस्त दुख निवृत्त हो जाते हैं।
41अभाग्यशाली नारी बहुत कष्ट झेलती है, उसका सुहाग कैसे स्थिर रह सकता है ॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं