गुरु ग्रंथ साहिब 578 · Raag Vadhans · Guru Arjan Dev Ji
1नानक का कथन है कि जिसकी अन्तरात्मा में मेरा परमात्मा निवास कर गया है, मैं उस पर टुकड़े-टुकड़े होकर कुर्बान होता हूँ॥ ३॥
2श्लोक॥
3जिन्हें राम को पाने की तीव्र लालसा लगी हुई है, वही उसके सच्चे सेवक कहलाते हैं।
4नानक इस सत्य को भलीभांति जानता है कि जगत का सांई अपने संतों से अलग नहीं है।॥१॥
5छंद ॥
6जैसे जल, जल से मिलकर अभेद हो जाता है,
7वैसे ही संतों की ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है।
8सर्वशक्तिमान जग के रचयिता परमात्मा में विलीन होकर जीव अपने आत्मस्वरूप को समझ लेता है।
9तब उसकी सहज ही शून्य समाधि लग जाती है और वह एक ईश्वर का ही ध्यान करता है।
10ईश्वर आप ही गुप्त है और आप ही माया के बन्धनों से मुक्त है और वह स्वयं ही अपने आप का बखान करता है।
11हे नानक ! ऐसे गुरुमुख व्यक्ति का भ्रम, भय एवं तीनों गुण-रजो, तमो एवं सतो गुण नाश हो जाते हैं और जैसे जल, जल में ही मिल जाता है वैसे ही वह परमात्मा में विलीन हो जाता है। ४ ॥ २ ॥
12वडहंसु महला ५ ॥
13हे प्रभु ! तू सबकुछ करने-कराने में समर्थ है,
14अपना हाथ देकर सारी दुनिया की रक्षा करो।
15तू ही समर्थ, शरण प्रदान करने योग्य, सबका मालिक, कृपानिधि एवं सुखों का दाता है।
16मैं तेरे उन सेवकों पर कुर्बान जाता हूँ, जो केवल एक ईश्वर को ही पहचानते हैं।
17उस परमात्मा का कोई रंग एवं चिन्ह वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका कथन अकथनीय है।
18नानक प्रार्थना करता है कि हे सबकुछ करने-करवाने में सर्वशक्तिमान प्रभु ! मेरी एक वन्दना सुनो॥ १॥
19ये जीव तेरे उत्पन्न किए हुए हैं और तू इनका रचयिता है।
20हे प्रभु ! तू दुःख-दर्द एवं भ्रम का नाश करने वाला है।
21हे दीनदयालु ! दुविधा, दुख-दर्द का नाश करके एक क्षण में मेरी रक्षा करो।
22तू ही माता-पिता, मालिक एवं मित्र है और यह सारा जगत तेरी संतान है।
23जो तेरी शरण में आता है, उसे गुणों का भण्डार प्राप्त हो जाता है और वह दुबारा न जन्म लेता है और न ही मृत्यु को प्राप्त होता है।
24नानक प्रार्थना करता है कि हे पूज्य परमेश्वर ! यह सभी जीव तेरे हैं और तू सबका रचयिता है॥ २॥
25दिन-रात परमात्मा का ध्यान करना चाहिए,
26इसके फलस्वरूप मनोवांछित फल प्राप्त हो जाते हैं।
27परमात्मा का ध्यान करने से मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और मृत्यु का भय मिट जाता है।
28संतों की सभा में सम्मिलित होकर जगतपालक गोविन्द का गुणगान करने से सभी आशाएँ पूरी हो गई हैं।
29अपना अहंकार, मोह एवं सभी विकार त्याग कर हम प्रभु के मन को अच्छे लगने लग गए हैं।
30नानक प्रार्थना करता है कि हमें दिन-रात सदा-सर्वदा भगवान का ध्यान करते रहना चाहिए॥ ३॥
31परमात्मा के दरबार में हमेशा ही अनहत कीर्तन गूंज रहा है।
32जगत का रक्षक गोविन्द प्रत्येक हृदय में बोल रहा है।
33वह सर्वदा ही बोलता एवं सभी के भीतर विराजमान है, वह अगम्य, मन-वाणी से परे एवं सर्वोपरि है।
34उस प्रभु के अनन्त गुण है, मनुष्य उसके गुणों का तिल मात्र भी वर्णन नहीं कर सकता और कोई भी उसके पास पहुँच नहीं सकता।
35वह स्वयं ही पैदा करता है, स्वयं ही पालन-पोषण करता है और सभी जीव-जन्तु उसकी ही रचना है।
36नानक प्रार्थना करता है कि जीवन के सभी सुख परमात्मा के नाम एवं भक्ति में हैं, जिसके द्वार पर अनहद नाद बजते रहते हैं॥४॥३॥
37रागु वडहंसु महला १ घरु ५ अलाहणीआ
38ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
39वह जगत का रचयिता सच्चा पातशाह, प्रभु धन्य है, जिसने सारी दुनिया को धन्धे में लगाया है।
40जब अन्तिम समय पूरा हो जाता है और जीवन प्याला भर जाता है तो यह प्यारी आत्मा पकड़ कर आगे यमलोक में धकेल दी जाती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं