गुरु ग्रंथ साहिब 577 · Raag Vadhans · Guru Arjan Dev Ji
1नानक कहते हैं कि ऐसे प्रभु-भक्त पर मैं बलिहारी जाता हूँ और तेरा दान सभी ने लिया है॥ २॥
2हे पूज्य परमेश्वर ! जब तुझे अच्छा लगा तो मैं तृप्त एवं संतुष्ट हो गया।
3मेरा मन शीतल हो गया है और मेरी समस्त तृष्णा मिट गई है।
4मेरा मन शीतल हो गया है, जलन भी मिट गई है और मुझे तेरे नाम का बड़ा भण्डार मिल गया है।
5गुरु के सभी सिक्ख एवं सेवक इसका सेवन करते हैं। मैं अपने सतगुरु पर कुर्बान जाता हूँ।
6मालिक के प्रेम-रंग में लीन हो जाने से मैं मृत्यु के आतंक को दूर करके निडर हो गया हूँ।
7दास नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! सदैव ही अपने सेवक के साथ रहो ताकि तेरे चरणों में वृत्ति लगाकर मैं तेरी भक्ति करता रहूँ॥ ३॥
8हे मेरे राम जी ! मेरी आशा एवं इच्छाएँ पूर्ण हो गई हैं।
9मैं गुणहीन हूँ और सभी गुण तुझ में ही विद्यमान हैं।
10हे मेरे ठाकुर ! समस्त गुण तुझ में ही हैं, फिर मैं किस मुँह से तेरी महिमा-स्तुति करूँ ?
11मेरे गुणों एवं अवगुणों की ओर तूने बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया और तूने मुझे एक क्षण में ही क्षमा कर दिया है।
12मैंने नवनिधियाँ प्राप्त कर ली हैं, शुभकामनाएँ गूंज रही हैं और अनहद-नाद बज रहे हैं।
13हे नानक ! मैंने अपने हृदय घर में अपने पति-प्रभु को पा लिया है और मेरी सभी चिंताएँ मिट गई हैं।॥ ४॥ १॥
14श्लोक ॥
15तुम क्यों झूठी बात सुनते रहते हो ? क्योंकि यह तो हवा के तेज झोंके की तरह लुप्त हो जाने वाली हैं।
16हे नानक ! वही कान परमात्मा को स्वीकार हैं, जो सच्चे परमेश्वर के नाम की महिमा सुनते हैं।॥ १॥
17छंद॥
18मैं उन पर न्यौछावर होता हूँ, जो अपने कानों से प्रभु का नाम सुनते हैं।
19जो अपनी जुबान से परमेश्वर का गुणगान करते हैं, वे सहज ही सुखी हैं।
20वे भी प्राकृतिक रूप से शोभायमान हैं एवं अमूल्य गुणों वाले हैं जो दुनिया का उद्धार करने के लिए आए हैं।
21प्रभु के सुन्दर चरण भवसागर से पार करवाने वाले जहाज हैं, जिन्होंने अनेकों को भवसागर से पार किया है।
22जिन पर मेरे ठाकुर जी ने कृपा-दृष्टि की है, उनसे उनके कर्मों का लेखा-जोखा नहीं पूछा जाता।
23नानक का कथन है कि मैं उन पर न्यौछावर होता हूँ, जिन्होंने अपने कानों से प्रभु की महिमा सुनी है॥ १॥
24श्लोक॥
25अपने नेत्रों से मैंने भगवान का आलोक देख लिया है, परन्तु उसे देखने की मेरी अत्यन्त प्यास समाप्त नहीं होती।
26हे नानक ! वे आँखें भाग्यवान हैं जिन से मेरा प्रिय-प्रभु देखा जाता है॥ १॥
27छंद ॥
28जिन्होंने मेरे हरि-प्रभु के दर्शन किए हैं, मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ।
29वही सच्चे दरबार में सत्कृत होते हैं।
30ठाकुर जी के स्वीकृत किए हुए वे सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं और हरि के प्रेम रंग में लीन रहते हैं।
31वे हरि रस से तृप्त होते हैं, सहज अवस्था में लीन रहते हैं और सर्वव्यापक परमात्मा को वे घट-घट में देखते हैं।
32जो अपने ठाकुर को अच्छे लगते हैं, वही सज्जन एवं संत सुखी रहते हैं।
33नानक का कथन है कि जिन्होंने हरि-प्रभु के दर्शन किए हैं, मैं उन पर हमेशा कुर्बान जाता हूँ॥ २॥
34श्लोक॥
35परमात्मा के नाम के बिना यह शरीर बिल्कुल अज्ञानपूर्ण एवं निर्जन है।
36हे नानक ! जिसके अन्तर्मन में सच्चे परमेश्वर का निवास है, उस प्राणी का जन्म सफल है॥ १॥
37छंद ॥
38जिन्होंने मेरे हरि-प्रभु के दर्शन किए हैं, उनके लिए टुकड़े-टुकड़े होकर न्यौछावर होता हूँ।
39हरिनामामृत का पान करके भक्तजन तृप्त हो गए हैं।
40उनके मन को तो परमेश्वर ही मीठा लगता है, प्रभु उन पर मेहरबान है, इसलिए उन पर अमृत बरसता है और वे सुख भोगते हैं।
41विश्व के मालिक जगदीश्वर का भजन एवं जय-जयकार करने से उनके शरीर के सभी दु:ख एवं भ्रम नाश हो गए हैं और
42पाँचों विकार-कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार की संगति भी हट गई है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं