सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 575 · Raag Vadhans · Guru Raam Daas Ji

1हे प्रभु ! मुझ पर कृपा करो और अपनी कृपा करके मेरा उद्धार करो।

2हम पापी एवं गुणविहीन हैं किन्तु फिर भी तुम्हारे तुच्छ सेवक हैं।

3हे दयालु परमेश्वर ! चाहे हम पापी निर्गुण हैं, फिर भी तुम्हारी शरण में आए हैं।

4तू दुखनाशक, सर्व सुखों का दाता है और हम पत्थर तुम्हारे पार करवाने से ही पार हो सकते हैं।

5हे नानक ! जिन्होंने सतगुरु से मिलकर राम रस पा लिया है, नाम ने उनका उद्धार कर दिया है।

6हे हरि ! मुझ पर कृपा करो और अपनी कृपा द्वारा मेरा संसार-सागर से उद्धार कर दो॥ ४॥ ४॥

7वडहंसु महला ४ घोड़ीआ

8ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

9यह देह रूपी घोड़ी राम ने उत्पन्न की है।

10यह मनुष्य जीवन बड़ा घन्य है जो पुण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है।

11यह मनुष्य जन्म बड़े पुण्य कर्म करने के फलस्वरूप ही मिला है और यह शरीर सोने की भाँति उत्तम है।

12गुरु के माध्यम से यह शरीर फूलों की भाँति गहरा रंग प्राप्त करता है और हरि-परमेश्वर के नवीन रंग में रंग जाता है।

13यह शरीर अति सुन्दर है जो हरि का जाप करता है और हरि-नाम से यह सुहावना हो गया है।

14अहोभाग्य से ही यह देह प्राप्त हुई है और परमेश्वर का नाम इसका साथी है। हे नानक ! इस शरीर की रचना राम ने की है॥ १॥

15मैंने देह रूपी घोड़ी पर राम की अच्छी सूझ रूपी काठी डाली है।

16इस शरीर रूपी घोड़ी पर सवार होकर मैं विषम संसार-सागर से पार होता हूँ।

17विषम संसार सागर में असंख्य ही तरंगें हैं और गुरु के माध्यम से ही जीव इससे पार होते हैं।

18हरि रूपी जहाज पर सवार होकर भाग्यशाली पार हो जाते हैं और गुरु खेवट अपने शब्द से जीवों को पार कर देता है।

19हरि के प्रेम से रंगा हुआ हरि का प्रेमी रात-दिन हरि का गुणगान करता रहता है और हरि जैसा ही हो जाता है।

20नानक ने निर्वाण पद पा लिया है, दुनिया में हरिं सर्वोत्तम है और हरि पद ही भला है।॥ २॥

21मुँह में लगाम के स्थान पर गुरु ने ज्ञान दृढ़ किया है।

22उसने प्रभु के प्रेम का चाबुक मेरे तन पर मारा है।

23प्रभु-प्रेम का चाबुक अपने तन पर मारकर गुरुमुख अपने मन को जीत कर जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त कर लेता है।

24अपने बेकाबू मन को वह काबू करता है, शब्द को प्राप्त होता है और सजीव करने वाले हरि-रस का पान करता है।

25गुरु की उच्चरित की हुई वाणी को अपने कानों से सुनकर अपनी देह की घोड़ी को हरि-प्रेम का रंग चढ़ा दिया है।

26नानक ने मृत्यु का महामार्ग पथ पार कर लिया है।३॥

27यह शरीर रूपी फुर्तीली घोड़ी राम ने उत्पन्न की है।

28यह शरीर रूपी घोड़ी धन्य-धन्य है, जिसके माध्यम से हरि-प्रभु की आराधना की जाती है।

29जिससे प्रभु का जाप किया जाता है, वह शरीर रूपी घोड़ी धन्य एवं सराहनीय है और यह पूर्व जन्म में किए गए शुभ कर्मों के संचय से ही प्राप्त होती है।

30जीव शरीर रूपी घोड़ी पर सवार होकर विषम संसार-सागर से पार हो जाता है और गुरु के माध्यम से परमानन्द प्रभु को मिल जाता है।

31पूर्ण परमेश्वर ने जीवात्मा का विवाह रचाया है और संतजनों की मिलकर बारात आई है।

32नानक का कथन है कि उसने हरि-परमेश्वर को वर के रूप में पा लिया है। संतजन मिलकर मंगल गीत गा रहे हैं और उसे शुभ-कामनाएँ दे रहे हैं।॥४॥१॥५॥

33वडहंसु महला ४ ॥

34यह देह हरि के सर्वदा नवीन रंग वाली घोड़ी है।

35मैंने गुरु से सत्य का ज्ञान माँगा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं