गुरु ग्रंथ साहिब 573 · Raag Vadhans · Guru Raam Daas Ji
1एक ईश्वर को मैं देखती हूँ, एक को जानती हूँ और एक को ही हृदय में अनुभव करती हूँ।
2मैं गुरु के बिना बड़ी विनीत एवं तुच्छ हूँ॥ १॥
3जिन्होंने सतगुरु को पा लिया है, हरि-प्रभु ने उन्हें गुरु से साक्षात्कार करवाकर अपने साथ मिला लिया है।
4मेरी यही कामना है कि मैं उनके चरणों की पूजा करूँ और उनके चरण स्पर्श करता रहूँ।
5हे ईश्वर ! मैं उनके चरणों की पूजा करूं, जिन्होंने सतगुरु महापुरुष प्रभु का ध्यान किया है।
6हे परमेश्वर ! तू ही बड़ा दाता है, तू ही अन्तर्यामी है, कृपा करके मेरी अभिलाषा पूरी कीजिए।
7गुरु के शिष्य को मिलकर मेरी अभिलाषा पूरी हो गई है और मैं रात-दिन राम के गुण गाता रहता हूँ।
8जिन्होंने सतगुरु को पा लिया है, हरि-प्रभु ने उन्हें गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लिया है॥ २॥
9मैं अपने मित्र-प्यारे गुरु के शिष्य पर सर्वदा न्यौछावार होता हूँ।
10वह मुझे हरि का नाम सुनाता है, प्रियतम-प्रभु का नाम मेरे जीवन का आधार है।
11हरि का नाम मेरे प्राणों का साथी है और इसके बिना मैं एक घड़ी एवं निमेष मात्र भी जीवित नहीं रह सकता
12अगर सुख देने वाला ईश्वर कृपा करे तो गुरुमुख बनकर मैं नामामृत का पान कर लूं।
13ईश्वर स्वयं ही निष्ठा लगाकर अपने संग मिला लेता है और वह स्वयं ही शोभायमान करता है।
14मैं अपने प्यारे मित्र गुरु के शिष्य पर कुर्बान जाता हूँ॥ ३॥
15वह निरंजन पुरुष हरि आप ही सर्वव्यापी है।
16वह सर्वशक्तिमान स्वयं ही जीव को अपने साथ मिलाता है, जो कुछ वह करता है, वही होता है।
17जो परमात्मा को मंजूर है वही होता है, उसकी मर्जी के बिना कुछ भी किया नहीं जा सकता।
18अधिक चतुराई करने से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि बहुत सारे चतुराई करने वाले थक गए हैं।
19गुरु की कृपा से नानक ने देख लिया है कि मेरे हरि-परमेश्वर के अलावा दूसरा कोई सहारा नहीं है।
20वह मायातीत ईश्वर ही सर्वव्यापी है॥ ४॥ २॥
21वडहंसु महला ४ ॥
22हे हरि ! मुझे सतगुरु से मिला दो, चूंकि सतगुरु के सुन्दर चरण मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।
23गुरु ने ज्ञान का सुरमा डालकर मेरी अज्ञानता का अन्धेरा दूर कर दिया है।
24सतगुरु से ज्ञान का सुरमा प्राप्त हुआ है, जिसने अज्ञानता का अँधेरा मिटा दिया है।
25सतगुरु की सेवा करने से मैंने परम पद प्राप्त किया है, मैंने श्वास - ग्रास हरि का नाम जपा है।
26जिस पर भी हरि प्रभु ने कृपा की है वह सतगुरु की सेवा में लगता है।
27हे हरि मेरा सतगुरु से मेल करा दो, क्योकि सतगुरु के सुन्दर चरण मुझे मधुर लगते हैं।॥ १॥
28मेरा सतगुरु मेरा प्रियतम है और गुरु के बिना मैं रह नहीं सकता।
29वह मुझे हरि का नाम प्रदान करता है जो अन्तिम क्षण तक मेरी सहायता करता है।
30हरि-नाम अन्तिम क्षणों तक मेरा सहायक होगा, गुरु सतगुरु ने मेरे नाम दृढ़ किया है।
31जहाँ पुत्र, स्त्री कोई भी मेरा साथी नहीं होगा, वहाँ हरि का नाम मुझे मुक्ति प्रदान करवाएगा।
32महापुरुष सतगुरु धन्य-धन्य हैं, वह मायातीत हैं, जिससे भेंट करके मैं हरि के नाम का ध्यान करता रहता हूँ।
33मेरा सतगुरु मेरा प्रियतम है और गुरु के बिना मैं रह नहीं सकता ॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं