गुरु ग्रंथ साहिब 572 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji
1वह अपने हृदय में अपना यथार्थ घर प्राप्त कर लेता है और सतगुरु उसे मान-सम्मान प्रदान करता है।
2हे नानक ! जो प्राणी परमेश्वर के नाम में लीन रहते हैं, वे सच्चे दरबार को प्राप्त कर लेते हैं और सच्चे प्रभु के सन्मुख उनकी मति स्वीकृत हो जाती है॥ ४॥ ६॥
3वडहंसु महला ४ छंत
4ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
5सतिगुरु ने मेरे मन में प्रभु से प्रीति लगा दी है।
6उसने मेरे मन में परमात्मा का हरिहरि नाम बसा दिया है।
7सभी दुख मिटाने वाला हरि का हरि-नाम गुरु ने मेरे मन में बसा दिया है।
8अहोभाग्य से मुझे गुरु के दर्शन प्राप्त हुए हैं और मेरा सतिगुरु धन्य-धन्य है।
9मैं उठते-बैठते गुरु की सेवा ही करता रहता हूँ, जिसकी सेवा के फलस्वरूप शांति प्राप्त हुई है।
10मेरे मन में सतिगुरु ने परमात्मा से प्रीति लगा दी है॥ १॥
11सतिगुरु को देखकर मैं जीता हूँ और मेरा मन फूलों की भाँति खिला रहता है।
12गुरु ने मेरे मन में हरि-नाम बसा दिया है और हरि-नाम जपकर मेरा मन खिला रहता है।
13हरि-नाम का भजन करने से हृदय-कमल खिल गया है और हरि-नाम द्वारा ही नवनिधियाँ प्राप्त कर ली हैं।
14अहंकार का रोग दूर हो गया है, पीड़ा भी मिट गई है और मैंने सहज अवस्था में हरि में समाधि लगाई है।
15हरि के नाम की कीर्ति मुझे सतिगुरु से प्राप्त हुई है और सुखदाता सतिगुरु के चरण-स्पर्श से मन आनंदित हो गया है।
16सतिगुरु को देखकर मैं जीवन जीता हूँ और मेरा मन फूलों की भाँति खिला रहता है॥ २॥
17कोई आकर मुझे मेरे पूर्ण सतिगुरु से मिला दे।
18मैं अपना मन-तन उसे अर्पण कर दूँगा और अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके उसे भेंट कर दूँगा।
19जो मुझे सतिगुरु के वचन सुनाएगा, मैं उसको अपने मन-तन के टुकड़े कर करके अर्पण कर दूँगा।
20मेरा वैरागी मन संसार से विरक्त हो गया है और गुरु के दर्शन करके इसे सुख प्राप्त हो गया है।
21हे सुखों के दाता ! हे हरि-परमेश्वर ! मुझ पर कृपा करो, मुझे सतिगुरु की चरण-धूलि प्रदान करो।
22कोई आकर मुझे मेरे पूर्ण सतिगुरु से मिला दे ॥ ३॥
23गुरु जैसा महान् दाता मुझे कोई अन्य नजर नहीं आता।
24वह मुझे हरि के नाम का दान प्रदान करता है और वह स्वयं ही निरंजन हरि-परमेश्वर है।
25जिन्होंने हरि-नाम की आराधना की है, उनका दु:ख, भ्रम एवं भय भाग गए हैं।
26वे लोग बड़े खुशनसीब हैं, जिन्होंने गुरु के चरणों में अपना मन लगाया है, वही सेवक भावना से परमात्मा को मिलते हैं।
27नानक का कथन है कि हरि-परमेश्वर स्वयं जीव को गुरु से मिलाता है और महापुरुष सतिगुरु को मिलने से सुख प्राप्त होता है।
28गुरु जैसा महान् दाता मुझे कोई और नजर नहीं आता ॥ ४॥ १॥
29वडहंसु महला ४ ॥
30गुरु के बिना में बड़ी विनीत एवं मानहीन थी
31गुरू के मिलाप से मैं जगत की जीवन देने वाले दाता परमेश्वर में विलीन हो गई हूँ।
32सच्चे गुरु के मिलाप से मैं हरि-नाम में समा गई हूँ और हरि-नाम का भजन एवं ध्यान करती रहती हूँ।
33जिस प्रभु को मिलने के कारण मैं खोज-तलाश कर रही थी, उस सज्जन हरि को मैंने हृदय-घर में ही पा लिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं