गुरु ग्रंथ साहिब 570 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji
1जिसे वह स्वयं सूझ प्रदान करता है, वही गुणवान प्राणी गुणों के मालिक में लीन रहता है और इस नश्वर दुनिया में परमात्मा की भक्ति का ही वह लाभ प्राप्त करता है।
2परमात्मा की भक्ति के बिना कहीं सुख प्राप्त नहीं होता, द्वैतभाव में फँसकर वह अपनी प्रतिष्ठा गंवा देता है और गुरु की मति द्वारा नाम ही आधार बनता है।
3ईश्वर जिसे इस नाम-व्यापार में लगाता है, वह नाम के सौदे का सर्वदा लाभ प्राप्त करता है।
4जब सतिगुरु सूझ प्रदान करता है तो ही जीव नाम रूपी रत्न पदार्थ का व्यापार करता है॥ १ ॥
5माया का मोह सब दुःख-संताप ही है और यह व्यापार बड़ा झूठा है।
6मनुष्य झूठ बोल-बोलकर माया रूपी विष ही खाता है और इसके फलस्वरूप उसके अन्दर बहुत सारे विकार बढ जाते हैं।
7इस प्रकार पाप बहुत बढ़ गए हैं और संसार में संशय बना रहता है। परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा गंवा देता है।
8पण्डित ग्रंथ पढ़-पढ़कर वाद-विवाद करते हैं परन्तु ज्ञान के बिना उन्हें भी सुख प्राप्त नहीं होता।
9उन्हें तो मोह-माया से ही प्रेम है, इसलिए उनका जन्म-मरण का चक्र कदापि नहीं मिटता।
10माया का मोह सब दुःख-संताप ही है और यह व्यापार बड़ा झूठा तथा खोटा है॥ २॥
11उस सच्चे परमेश्वर के दरबार में सभी बुरे एवं भले जीव परखे जाते हैं।
12बुरे जीव प्रभु के दरबार से बाहर निकाल दिए जाते हैं और वे खड़े होकर हमेशा रोते रहते हैं।
13विमूढ़ एवं गंवार खड़े होकर विलाप करते हैं। इस प्रकार ऐसे मनमुख व्यक्ति अपना अमूल्य जीवन विनष्ट कर लेते हैं।
14माया रूपी विष ने समूचे संसार को भुला दिया है और उसे सच्चे परमेश्वर का नाम अच्छा नहीं लगता।
15मनमुख व्यक्ति संतजनों से वैर करके दुनिया में दुःख ही प्राप्त करते हैं।
16उस सच्चे परमेश्वर के दरबार में खोटे एवं भले जीवों की परख की जाती है।॥ ३॥
17परमेश्वर आप ही जीवों को अच्छा-बुरा बनाता है। इसलिए किसी से गिला-शिकवा नहीं किया जा सकता क्योंकि दूसरा कोई कुछ नहीं कर सकता।
18जैसे उसकी कीर्ति है और जैसे उसकी खुशी है, वह वैसे ही जीवों को लगाता है।
19जैसे उस परमात्मा का बड़प्पन है, वह स्वयं वैसे ही जीवों से करवाता है और अपने आप कोई महान् योद्धा अथवा कायर नहीं।
20दाता परमेश्वर जगत को जीवन प्रदान करने वाला एवं कर्म-विधाता है और वह स्वयं ही क्षमा करता है।
21हे नानक ! गुरु की कृपा से ही अहंकार निवृत्त होता है और परमात्मा के नाम के फलस्वरूप मान-सम्मान प्राप्त होता है। परमेश्वर स्वयं ही जीवों को अच्छा बुरा बनाता है।
22इसलिए किसी से गिला-शिकवा नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कोई कुछ नहीं कर सकता ॥ ४॥ ४॥
23वडहंसु महला ३ ॥
24हरि का नाम ही सच्चा सौदा है और यही सच्चा व्यापार है।
25गुरु के उपदेश द्वारा ही हरि के नाम का व्यापार करना चाहिए और इस सच्चे नाम का व्यापार अत्यंत मूल्यवान एवं महान् है।
26इस सच्चे व्यापार का मूल्य अनन्त एवं बहुमूल्य है, जो लोग इस सच्चे व्यापार में क्रियाशील हैं, वे बड़े भाग्यशाली हैं।
27भीतर एवं बाहर से ऐसे प्राणी परमात्मा की भक्ति में लीन रहते हैं और सच्चे नाम में उनकी सुरति लगी रहती है।
28जो गुरु के शब्द का चिंतन करता है और जिस पर परमात्मा कृपा-दृष्टि करता है, उसे ही सत्य की प्राप्ति होती है।
29हे नानक ! जो सत्यनाम में लीन रहते हैं, उन्हें ही सुख प्राप्त होता है और वही सच्चे परमेश्वर के नाम के सच्चे व्यापारी हैं।॥ १॥
30अहंत्व माया की मैल है और यह माया की मैल इन्सान के मन में भर जाती है।
31गुरु की मति द्वारा मन अहंत्व की मैल से निर्मल हो जाता है। अतः रसना द्वारा हरि रस पीते रहना चाहिए।
32रसना द्वारा हरि रस पीने से इन्सान का हृदय परमेश्वर के प्रेम से भीग जाता है और सच्चे नाम का ही चिंतन करता रहता है।
33जीवात्मा के अन्तर्मन में ही हरि के अमृत का सरोवर भरा हुआ है और नाम-सुमिरन द्वारा पनिहारिन इसे निकाल कर पान करती है।
34जिस पर परमात्मा की कृपा-दृष्टि होती है, यही सत्य से लगता है और उसकी रसना परमात्मा के नाम का भजन करती है।
35हे नानक ! जो लोग परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं, वही पवित्र-पावन हैं और शेष जीव अहंकार की मैल से भरपूर हैं।॥ २॥
36सभी पण्डित एवं ज्योतिषी पढ़-पढ़कर उच्च स्वर में उपदेश देते हैं किन्तु ये उच्च स्वर में किसे सुना रहे हैं ?
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं