गुरु ग्रंथ साहिब 56 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1मुख झूठा हो तो झूठा मनुष्य असत्य वचन ही व्यक्त करता है, फिर वह किस तरह पवित्र-पावन हो सकता है?
2नाम (भक्ति) के जल बिना आत्मा स्वच्छ नहीं होती। सत्य नाम द्वारा ही सत्य प्रभु प्राप्त होता है॥ १॥
3हे भोली जीव-स्त्री ! गुण के बिना सुख कहाँ है?
4प्रियतम प्राणपति उनके साथ आनंद एवं रस के साथ रमण करता है जो सत्य नाम की प्रीति के भीतर शांति-सुख अनुभव करते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
5यदि प्राणपति परदेस चला जाए तो नारी (जीवात्मा) वियोग में ऐसे पीड़ित अनुभव करती है
6जिस तरह थोड़े से जल में मछली तड़पती है।
7जब प्राणपति को अच्छा लगता है तो वह स्वयं ही अपनी कृपा-दृष्टि करता है और पत्नी को सुख-समृद्धि प्राप्त हो जाती है।॥२॥
8अपनी सखियों एवं सहेलियों के साथ बैठकर हे जीवात्मा ! तू अपने पति परमेश्वर का यशोगान कर।
9उसके दर्शन करने से तेरा शरीर सुन्दर तथा मन मोहित हो गया है और तू उसकी प्रीति के साथ रंग गई है।
10सुन्दर पत्नी, जिसने नाम के साथ शृंगार किया है, वह गुणवती होकर अपने पति की भरपूर सेवा करती है॥३॥
11बुराइयों तथा विषय-विकारों में लिप्त नारी गुणहीन होने के कारण पति के किसी भी काम नहीं आती।
12इस जीवात्मा को न तो बाबुल के घर (इहलोक) में सुख मिलता है और न ही ससुराल (परलोक) में और वह बुराइयों तथा पापों के अंदर व्यर्थ ही तड़पती रहती है।
13उसका आवागमन (जन्म-मरण) बड़ा दुलर्भ है, जिसे उसके पति ने प्रेम से वंचित करके भुला दिया है॥४॥
14प्राणपति परमेश्वर की अति सुन्दर नारी सुहागिन है, किन्तु विषय-विकारों के कारण भोक्ता के लिए जीवन का कोई भी रस नहीं।
15जो नारी व्यर्थ ही विवादपूर्ण बकवास करती है, वह पति के किसी भी काम योग्य नहीं।
16सांसारिक रसों के कारण वह त्याग दी गई है और उसको अपने स्वामी के द्वार एवं मंदिर में आश्रय नहीं मिलता ॥५॥
17पण्डित धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं परन्तु वे यथार्थ ज्ञान का मनन नहीं करते।
18वे दूसरों को उपदेश देते रहते हैं। किन्तु स्वयं ज्ञान की उपलब्धि के बिना संसार से चले जाते हैं। उन्होंने उपदेश देने को धन ऐंठने का व्यापार बना लिया है।
19उनकी झूठी कथनी से गुमराह होकर सारा संसार भटक रहा है। सत्य नाम की कमाई करना ही श्रेष्ठ जीवन आचरण है II६II
20कितने ही पंडित तथा ज्योतिष वेदों को सोचते-विचारते हैं।
21वे विवादों एवं निरर्थक झगड़ों की प्रशंसा करते हैं और वाद-विवाद में फंसे जन्म-मरण के चक्कर में आवागमन करते रहते हैं।
22किन्तु गुरु के बिना उनकी अपने कर्मो से मुक्ति नहीं होनी, चाहे वे जितने भी कथन, श्रवण करें, उपदेश दें अथवा व्याख्या करते रहें। गुरु की अपार कृपा के बिना इनकी मुक्ति नहीं हो सकती॥ ७॥
23समस्त जीव-स्त्रियों को गुणवान कहा जाता है परन्तु मुझ में कोई भी गुण विद्यमान नहीं।
24यदि प्रभु मुझे भी पसंद करने लगे तो मैं भी प्रभु की सुन्दर पत्नी बन सकती हूँ।
25हे नानक ! जीव-स्त्री का प्रभु-पति से मिलन नाम द्वारा ही होता है। प्रभु से मिलन उपरांत फिर उसका पति से बिछोड़ा कभी नहीं होता ॥८॥५॥
26श्रीरागु महला १ ॥
27भगवान का भजन किए बिना मनुष्य को जप, तपस्या एवं संयम की साधना करने, तीर्थ स्थलों में जाकर निवास करने,
28पुण्य-दान इत्यादि अन्य शुभ कर्म करने का कोई लाभ नहीं होता।
29प्राणी जैसा बोता है, वैसा ही फल काटता है। गुण ग्रहण किए बिना मानव जीवन व्यर्थ ही व्यतीत हो जाता है।॥१॥
30हे भोली जीव-स्त्री ! दासी वाले गुण पैदा करने से सुख उपलब्ध होता है।
31अवगुणों का त्याग करके गुरु की मति द्वारा पूर्ण प्रभु में समाया जाता है॥१॥ रहाउ॥
32जिस व्यापारी के पास गुणों की पूँजी विद्यमान नहीं, वह चारों दिशाओं में व्यर्थ भटकता रहता है।
33वह मूल-प्रभु का नाम बोध नहीं करता। नाम रूपी वस्तु उसके दसम द्वार रूपी घर में विद्यमान है।
34इस नाम-वस्तु के बिना वह बहुत दुखी होता है। झुठी माया ने झूठ का व्यापार करने वाले को ठग लिया हैII२II
35जो नाम-रत्न का ध्यान से सिमरन (जांच पड़ताल) करता है, उसे नित्य अधिकाधिक लाभ मिलता है।
36वह नाम रूपी वस्तु को अपने हृदय गृह में ही पा लेता है और अपने कार्य को संवार गमन करता है अर्थात् जीवन में शुभ कर्म करके अपने जीवन को सफल करके परमात्मा में विलीन हो जाता है।
37ईश्वर के व्यापारियों (भक्तों) के साथ व्यापार (भक्ति) करो और अपने गुरु से मिलकर परमेश्वर का चिंतन करो ॥३॥
38साधु-संगति द्वारा ही प्रभु को पाया जाता है, जब प्रभु से मिलन करवाने वाले गुरु जी अपनी दया से प्राणी को परमात्मा से मिलाते हैं।
39जिस की आत्मा के भीतर प्रभु का अनन्त प्रकाश प्रज्वलित है, वह उसे मिल जाता है और पुनः जुदा नहीं होता अर्थात् जीवन-मृत्यु के चक्र से छूटकर वह मोक्ष प्राप्त करता है।
40ऐसे पुरुष का निवास सत्य है, जो सत्य के भीतर निवास करता है और सत्य स्वरूप परमेश्वर के प्रेम में सदैव विचरता है II ४ II
41जीवात्मा का स्वरूप ज्योति है। जिसने अपने इस स्वरूप को पहचान लिया है, वह अपने हृदय गृह के श्रेष्ठ स्थान में ही स्वामी के मन्दिर को पा लेते हैं।
42सत्य नाम के रंग में लिवलीन होने से सत्य प्रभु प्राप्त हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं