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गुरु ग्रंथ साहिब 568 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji

1पति-परमेश्वर प्रत्येक हृदय में विद्यमान है; तू उसे प्रत्यक्ष देख और युग-युगान्तरों में उसे एक समान ही अनुभव कर।

2मासूम जीव-स्त्री भोलेपन में सहज ही अपने पति-प्रभु के साथ रमण करती है एवं अपने कर्मविधाता प्रभु को मिल जाती है।

3जो जीव-स्त्री हरि-रस को चखती है, वह प्रेमपूर्वक नाम का उच्चारण करती है और वह परमेश्वर के अमृत सरोवर में लीन रहती है।

4हे नानक ! प्रिय-प्रभु को वही जीव-स्त्री लुभाती है, जो गुरु के शब्द द्वारा प्रत्यक्ष रहती है॥ २॥

5हे जीवात्मा ! उन सुहागिनों से भी जाकर पूछ लो, जिन्होंने अपना अहंत्व मिटा दिया है।

6जिन्होंने अपना अहंत्व नहीं मिटाया, उन्होंने अपने पति-प्रभु के हुक्म को अनुभव नहीं किया।

7लेकिन जिन्होंने अपना अहंत्व मिटा दिया है, उन्हें अपना पति-प्रभु मिल गया है और प्रेम-रंग में लीन होकर रमण करती हैं।

8अपने प्रभु के प्रेम में सदैव रंगी और सहज ही मतवाली हुई वह रात-दिन उसका नाम जपती रहती है।

9वह जीव-स्त्री बड़ी भाग्यशाली है, जिसके हृदय में पति-प्रभु की ही सुरति लगी हुई है और परमेश्वर का प्रेम मीठा लगता है।

10हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने सत्य के साथ श्रृंगार किया है, वह सहज ही अपने पति-प्रभु के प्रेम में लीन रहती है॥ ३॥

11हे नाशवान् जीवात्मा ! तू अपना अहंकार नष्ट कर दे और गुरु की रज़ा पर अनुसरण कर।

12इस तरह तू परमेश्वर के साथ हमेशा आनंद उपभोग करेगी और अपने मूल घर आत्मस्वरूप में निवास प्राप्त कर लेगी।

13अपने मूल निवास प्रभु के पास रहकर वह नाम का उच्चारण करती है और सदा सुहागिन नारी हो जाती है।

14प्रिय-प्रभु बड़ा रंगीला एवं यौवन सम्पन्न है; वह रात-दिन अपनी पत्नी को संवारता है।

15अपने सुहाग हरि-परमेश्वर द्वारा उसके माथे के भाग्य उदय हो जाते हैं और वह सच्चे शब्द से शोभावान हो जाती है।

16हे नानक ! जब जीव-स्त्री सतिगुरु की शिक्षा पर अनुसरण करती है तो वह परमेश्वर के प्रेम-रंग में लीन हो जाती है॥ ४॥ १॥

17वडहंसु महला ३ ॥

18गुरुमुख बनकर सभी व्यापार भले हैं, यदि ये सहज अवस्था द्वारा किए जाएँ।

19हर समय परमात्मा के नाम का जाप करना चाहिए और हरि रस को पान करने का लाभ प्राप्त करना चाहिए।

20हरि-रस का लाभ प्राप्त करना चाहिए, हरि का सुमिरन करना चाहिए और रात-दिन नाम का चिंतन करते रहना चाहिए।

21जो व्यक्ति गुणों का संग्रह करता है और अवगुणों को मिटा देता है; इस तरह वह अपने आत्मस्वरूप को पहचान लेता है।

22वह गुरु की मति द्वारा नाम रूपी बड़ी शोभा पा लेता है और सच्चे शब्द द्वारा हरि-रस का पान करता रहता है।

23हे नानक ! हरि की भक्ति बड़ी विलक्षण है और कोई विरला गुरुमुख ही भक्ति करता है॥ १॥

24गुरुमुख बनकर अपने अन्तर्मन में परमेश्वर रूपी खेती बोनी चाहिए और अपने शरीर में नाम रूपी बीज उगाना चाहिए।

25इस तरह तुम अपने हृदय-घर में ही हरि के नाम रस को चख लोगो और परलोक में भी इसका लाभ प्राप्त करोगे।

26हरि-परमेश्वर को अपने अन्तर्मन में बसाने की खेती एवं व्यापार धन्य है, जिस द्वारा परलोक में लाभ होता है।

27जो व्यक्ति हरि-नाम का ध्यान करता है और इसे अपने मन में बसाता है, वह गुरु के उपदेश को समझ लेता है।

28मनमुख प्राणी सांसारिक मोह-माया की खेती एवं व्यापार करके थक गए हैं और उनकी तृष्णा एवं भूख दूर नहीं होती।

29हे नानक ! अपने मन के भीतर परमात्मा के नाम का बीज बोया कर और सच्चे शब्द द्वारा शोभायमान हो जा॥ २ ॥

30वही लोग हरि-परमेश्वर के नाम-व्यापार में सक्रिय हैं, जिनके माथे पर सौभाग्य की मणि उदय होती है।

31गुरु-उपदेश द्वारा मन अपने मूल घर प्रभु-चरणों में बसता है और सच्चे शब्द के माध्यम से मोह-माया से निर्लिप्त हो जाता है।

32जिनके मुख-मस्तक पर भाग्य उदय हो जाते हैं, वही सच्चे बैराग को प्राप्त होते हैं और वही विचारवान सच्चे नाम में लीन हो जाते हैं।

33हरि-नाम बिना सारी दुनिया मोह-माया में फँसकर बावली हो रही है और शब्द द्वारा ही अहंकार का नाश होता है।

34सत्यनाम में लीन होने से सुमति उत्पन्न होती है और गुरु के माध्यम से हरि-नाम रूपी सुहाग मिल जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं