गुरु ग्रंथ साहिब 567 · Raag Vadhans · Guru Nanak Dev Ji
1तेरा शासन कदापि नष्ट नहीं होता।
2तेरा शासन सदैव अटल है यह कदापि नाश नहीं होता, अर्थात् अनश्वर है।
3तेरा तो वही सच्चा सेवक है, जो सहज अवस्था में लीन रहता है।
4कोई दुश्मन एवं दुःख मूल रूप से उसे स्पर्श नहीं करते और न ही पाप उसके निकट आते हैं।
5हे परमेश्वर ! मैं एक तेरे नाम पर सर्वदा कुर्बान जाता हूँ॥ ४॥
6हे हरि ! युग-युगान्तरों से तुम्हारे ही भक्त हुए हैं। वे तेरे द्वार पर खड़े होकर तेरी ही कीर्ति करते रहे हैं।
7वे एक सत्यस्वरूप मुरारि का ही भजन करते हैं और
8सच्चे मुरारि का तभी भजन करते हैं जब वे उसे अपने मन में बसा लेते हैं।
9यह भ्रम का भुलावा जो तूने खुद ही पैदा किया है, तू इसे दूर कर देता है।
10गुरु की कृपा द्वारा मुझ पर भी कृपा करो और मुझे यम से बचा लो।
11हे हरि ! युगों-युगान्तरों से तुम्हारे ही भक्त तेरी महिमा कर रहे हैं।॥ ५ ॥
12हे मेरे सर्वोच्च परमेश्वर ! तू अलक्ष्य एवं अपार है।
13मैं किस तरह तेरे समक्ष प्रार्थना करूँ ? मैं नहीं जानता कि मैं किस तरह प्रार्थना करूँ।
14यदि तुम मुझ पर कृपा-दृष्टि करो तो ही मैं सत्य को पहचान सकता हूँ।
15मैं तेरे सत्य को तभी समझ सकता हूँ, यदि तुम स्वयं मुझे सूझ प्रदान करोगे।
16दु:ख एवं भूख तूने ही दुनिया में रचे हैं और इस चिन्ता-तनाव से मुझे मुक्त कीजिए।
17नानक प्रार्थना करता है कि मनुष्य की चिन्ता-तनाव तभी दूर होता है, यदि वह गुरु की शिक्षा को समझ ले।
18वह महान् परमात्मा आप ही अलक्ष्य एवं अनन्त है॥ ६॥
19हे पूज्य परमेश्वर ! तेरे नयन अत्यन्त सुन्दर हैं और तेरे दाँत भी अनुपम हैं।
20जिस परमात्मा के बड़े लम्बे केश हैं, उसकी नाक बहुत सुन्दर है।
21तेरी कचन काया स्वर्ण रूप में ढली हुई है।
22हे मेरी सहेलियो ! स्वर्ण में ढली हुई उसकी काया एवं कृष्ण (वर्ण जैसी) माला उसके पास है, उसकी आराधना करो।
23हे सहेलियो ! यह उपदेश ध्यानपूर्वक सुनो कि उसकी आराधना करने से यमदूत तुम्हारे द्वार पर खड़ा नहीं होगा।
24तुम्हारे मन की मैल निवृत्त हो जाएगी और साधारण हंस से सर्वश्रेष्ठ हंस बन जाओगे।
25हे पूज्य परमेश्वर ! तेरे नयन अत्यन्त सुन्दर हैं और तेरे दाँत बड़े रसदायक एवं अमूल्य हैं।॥ ७॥
26हे प्रभु ! तेरी चाल बड़ी सुहावनी है और तेरी वाणी भी बड़ी मधुर है।
27तुम कोयल की भाँति बोलते हो और तुम्हारा चंचल यौवन मदमस्त है।
28तेरा मदमस्त चंचल यौवन तुझे ही अच्छा लगता है। इसका दर्शन मन की इच्छाओं को पूर्ण कर देता है।
29तुम हाथी की भाँति आहिस्ता-आहिस्ता चरण रखते हो और अपने आप में मदमस्त रहते हो।
30जो जीवात्मा अपने परमेश्वर के प्रेम में लीन है, वह मस्त होकर गंगा-जल की भाँति क्रीड़ाएँ करती है।
31हरि का सेवक नानक विनती करता है कि हे हरि ! तेरी चाल बड़ी सुहावनी है और तेरी वाणी भी बड़ी मधुर-मीठी है॥ ८ ॥ २॥
32वडहंसु महला ३ छंत
33ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
34हे नाशवान् सुन्दर नारी ! तू अपने प्रिय-प्रभु के प्रेम-रंग में मग्न हो चुकी है।
35तू सच्चे शब्द द्वारा अपने पति-प्रभु से मिल गई है और वह प्रेम-प्यार से तेरे साथ रमण करता है।
36तू अपने प्रेम द्वारा सच्चे प्रभु की प्रियतमा बन गई है, तेरे स्वामी ने तुझे नाम द्वारा सुन्दर बना दिया है। तूने भगवान के साथ प्रेम बना लिया है।
37जब तूने अपने अभिमान को दूर किया तो ही तूने अपने पति-प्रभु को पाया है और तेरा मन गुरु के शब्द द्वारा प्रभु में समाया रहता है।
38ऐसी जीव-स्त्री जिसे उसके स्वामी के प्रेम ने आकर्षित किया हुआ है और जिसके अन्तर्मन को उसकी प्रीति प्यारी लगती है, वह उसके नाम से सुहावनी हो जाती है।
39हे नानक ! प्रिय-पति ने उस जीव-स्त्री को अपने साथ मिला लिया है तथा सच्चे बादशाह ने उसे अपने नाम से श्रृंगार दिया है॥ १॥
40हे गुणहीन जीवात्मा ! अपने पति-परमेश्वर को सदैव प्रत्यक्ष दृष्टिमान कर।
41हे नाशवान् नववधू! जो गुरु के माध्यम से अपने प्रभु को स्मरण करती है, वह उसे परिपूर्ण व्यापक देखती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं