गुरु ग्रंथ साहिब 562 · Raag Vadhans · Guru Raam Daas Ji
1हे नानक ! मेरा पूर्ण गुरु-सतगुरु धन्य-धन्य है, जो मेरे मन की आशा पूरी करता है॥ ४ ॥
2हे हरि ! मुझे मेरा सज्जन गुरु मिला दो, जिससे मिलकर मैं हरि-नाम का ध्यान करता रहूँ।
3मैं गुरु-सतगुरु से हरि की गोष्टि-वार्ता पूंछू और उससे सांझ डालकर हरि का गुणगान करूँ।
4हे हरि ! मैं नित्य-नित्य सर्वदा ही तेरा गुणगान करता रहूँ और तेरा नाम सुनकर मेरा मन आध्यात्मिक रूप से जीवित है।
5हे नानक ! जिस समय मुझे मेरा स्वामी प्रभु विस्मृत हो जाता है, उस समय मेरी आत्मा मर जाती है।॥ ५॥
6हर कोई हरि-दर्शन की तीव्र लालसा करता है लेकिन हरि उसे ही अपने दर्शन देता है, जिसे वह अपने दर्शन स्वयं प्रदान करता है।
7मेरा प्रियतम जिस पर कृपा-दृष्टि करता है, वह सर्वदा ही परमेश्वर का सिमरन करता है।
8जिसे मेरा पूर्ण सतगुरु मिल जाता है, वह सर्वदा ही हरि-नाम की आराधना करता रहता है।
9हे नानक ! हरि का सेवक एवं हरि एक ही रूप हो गए हैं।चूंकि हरि का जाप करने से हरि-सेवक भी हरि में ही समा गया है॥ ६ ॥ १॥ ३ ॥
10वडहंसु महला ५ घरु १
11ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
12उस भगवान का दरबार अत्यंत ऊँचा है तथा
13उसका कोई अन्त अथवा कोई ओर-छोर नहीं।
14करोड़ों, करोड़ों, करोड़ों-लाखों ही जीव भागदौड़ करते हैं किन्तु
15उसके यथार्थ निवास का भेद एक तिल मात्र भी नहीं पा सकते॥ १॥
16वह कौन-सा समय शुभ सुहावना है, जब प्रभु से मिलन होता है॥ १॥ रहाउ ॥
17जिस परमात्मा की लाखों ही भक्त आराधना करते हैं।
18लाखों ही तपस्वी उसकी तपस्या करते हैं।
19लाखों ही योगेश्वर योग-साधना करते हैं।
20लाखों ही भोगी उसके भोगों को भोगते रहते हैं।॥ २॥
21वह प्रत्येक हृदय में निवास करता है परन्तु बहुत थोड़े ही इसे जानते हैं।
22क्या कोई ऐसा सज्जन है, जो प्रभु और हमारे बीच बनी हुई झूठ की दीवार को तोड़ दे ?
23मैं कोई ऐसा प्रयास करता हूँ कि वह परमात्मा हम पर मेहरबान हो जाए और
24फिर मैं उस पर अपना जीवन न्यौछावर कर दूँ॥ ३ ॥
25प्रभु-खोज में भटकता-भटकता मैं संतों के पास आया हूँ और
26उन्होंने मेरे सभी दुःख एवं भ्रम मिटा दिए हैं।
27नामामृत का पान करने के लिए प्रभु ने मुझे अपने चरणाश्रय में बुलाया है।
28हे नानक ! मेरा प्रभु सबसे बड़ा एवं सर्वोपरि है॥ ४॥ १॥
29वडहंसु महला ५॥
30वह समय बड़ा शुभ एवं धन्य है, जब परमात्मा के दर्शन प्राप्त होते हैं।
31मैं अपने सतिगुरु के चरणों पर बलिहारी जाता हूँ॥ १॥
32हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तुम हम सभी के प्राणदाता हो।
33मेरा मन तो प्रभु का नाम-स्मरण करने से ही जीवित है॥ १॥ रहाउ॥
34हे सर्वेश्वर ! तुम्हारा नाम-मंत्र ही सत्य है और तुम्हारी वाणी अमृत है।
35तू शीतल शान्ति देने वाला है और तेरी दृष्टि त्रिकालदर्शी है॥ २॥
36तुम्हारा हुक्म सत्य है और तुम ही सिंहासन पर विराजमान होने वाले हो।
37मेरा प्रभु अमर है और वह जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता॥ ३॥
38तुम हमारे मेहरबान मालिक हो और हम तेरे दीन सेवक हैं।
39हे नानक ! सबका मालिक प्रभु सर्वव्यापक है॥ ४॥ २॥
40वडहंसु महला ५ ॥
41हे हरि ! तू बेअंत है और कोई विरला ही इस रहस्य को जानता है।
42गुरु की कृपा से कोई विरला ही शब्द की पहचान करता है॥ १॥
43हे प्रियतम ! तेरे सेवक की यही विनम्र प्रार्थना है कि
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं