सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 55 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1नाम द्वारा इन्सान पूज्य प्रभु को पहचान लेता है और गुरु की वाणी द्वारा वह सत्य के रंग में लिवलीन हो जाता है।

2उस प्राणी की देहि को तुच्छ मात्र भी मलिनता नहीं लगती, जिसने सच्चे घर के भीतर निवास कर लिया है।

3यदि प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करे तो सत्यनाम प्राप्त हो जाता है। परमात्मा के नाम के अतिरिक्त प्राणी का अन्य संबंधी कौन है? ॥ ५॥

4जिन्होंने सत्य को अनुभव किया है, वे चारों युगों में सुखी रहते हैं।

5अहंकार एवं तृष्णा का नाश करके वह सत्य-नाम को अपने हृदय में धारण करके रखते हैं।

6इस जगत् में केवल नाम (प्रभु-भक्ति) का ही लाभ उचित है। इसकी प्राप्ति केवल गुरु की कृपा सोच-विचार द्वारा ही होती है।॥ ६॥

7यदि सत्य की पूँजी द्वारा सत्यनाम का सौदा व्यवसायिक तौर पर किया जाए तो सदैव ही लाभ होता है।

8प्रेममयी सुमिरन एवं सच्ची लगन से प्रार्थना द्वारा मनुष्य ईश्वर के दरबार के अन्दर बैठ जाता है।

9सर्वव्यापक परमेश्वर के नाम के उजाले में मनुष्य का हिसाब सम्मान-पूर्वक व स्पष्ट हो जाता है।॥ ७॥

10बुलंदों में परम बुलंद स्वामी कहा जाता है, पर वह किसी द्वारा भी नहीं देखा जा सकता।

11जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ, सर्वत्र में केवल तुझे ही पाता हूँ। मुझे सतिगुरु ने आपके दीदार-दर्शन करवा दिए हैं।

12हे नानक ! प्रेम द्वारा सहज अवस्था प्राप्त होने पर हृदय में विद्यमान प्रभु की ज्योति की सूझ होती है। ॥ ८॥३॥

13श्रीरागु महला १ ॥

14जब मछली की मृत्यु आई तो उसने मछेरे के जाल की पहचान नहीं की। वह गहरे खारे समुद्र में रहती है।

15वह बहुत चतुर एवं सुन्दर है। उसने मछेरे पर विश्वास क्यों किया?

16वह विश्वास करने के कारण ही जाल में पकड़ी गई। उसके सिर पर मृत्यु को टाला नहीं जा सकता, जो अटल है॥ १॥

17हे भाई ! इस तरह तू मृत्यु को अपने सिर पर मंडराता हुआ समझ, क्योंकि काल बहुत बलवान है।

18जिस तरह मछली है, उसी तरह ही मनुष्य है। मृत्यु का जाल अकस्मात ही उस पर आ गिरता है॥ १॥ रहाउ ॥

19सारे संसार को काल (मृत्यु) ने दबोचा हुआ है। गुरु की कृपा बिना मृत्यु अनिवार्य है।

20जो सत्य में लिवलीन हो गए हैं और द्वैत-भाव तथा पापों को त्याग देते हैं, वह बच जाते हैं।

21मैं उन पर कुर्बान हूँ, जो सत्य के दरबार में सत्यवादी माने जाते हैं।॥२॥

22जैसे बाज पक्षियों को मार देता है और शिकारी के हाथ में पकड़ा हुआ जाल उन्हें फँसा लेता है, वैसे ही माया के मोह के कारण सभी मनुष्य यम के जाल में फंस जाते हैं।

23जिनकी गुरदेव रक्षा करते हैं, वह यम के जाल से बच जाते हैं, शेष दाने (मृत्यु) के साथ फँस जाते हैं।

24हरि नाम के बिना वे मृत्यु के वश में दाने की तरह चुन लिए जाएँगे, फिर उनका कोई भी साथी या सहायक नहीं होगा।॥३॥

25सत्य प्रभु को सभी सत्य कहते हैं। सत्य प्रभु का निवास भी सत्य है

26सत्य प्रभु उनके हृदय में निवास करता है, जो उसका सिमरन एवं ध्यान करते हैं।

27गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त करने वाले प्राणियों के हृदय एवं मुख पवित्र माने जाते हैं।॥ ४॥

28हे प्राणी ! सतिगुरु के समक्ष वंदना करो कि वह तुझे तेरे मित्र (प्रभु) से मिलन करवा दे।

29मित्र (ईश्वर) के मिलन से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है और यमदूत विष सेवन करके कालवश हो जाते हैं।

30मैं परमात्मा के नाम (भक्ति) में वास करता हूँ और नाम ने मेरी आत्मा में निवास कर लिया है॥ ५॥

31गुरु के बिना मनुष्य के हृदय में अज्ञानता का अन्धेरा विद्यमान रहता है और ईश्वर के नाम के बिना उसे ज्ञान-बुद्धि की प्राप्ति नहीं होती।

32जब गुरु की मति द्वारा उसके भीतर ज्योति का प्रकाश होता है, फिर वह सत्य प्रभु में सुरति लगाकर रखता है।

33इस अवस्था में वहाँ मृत्यु प्रवेश नहीं करती और मनुष्य की ज्योति (आत्मा) परम ज्योति (परमात्मा) के साथ अभेद हो जाती है॥ ६॥

34हे प्रभु ! तुम बुद्धिमान हो, तुम मेरे मित्र हो और तुम ही मनुष्य को अपने साथ मिलाने वाले हो।

35मैं गुरु की वाणी द्वारा तेरी महिमा करता हूँ। तेरा अन्त नहीं पाया जा सकता एवं ओर-छोर भी नहीं पाया जा सकता। गुरु बेअंत है।

36जहाँ पर गुरु का अनहद शब्द विद्यमान है, काल वहाँ पर कदापि प्रवेश नहीं करता॥ ७ ॥

37प्रभु की इच्छा द्वारा समस्त जीव-जन्तु उत्पन्न होते हैं और उसकी इच्छानुसार ही वे कार्य व्यवहार करते हैं।

38प्रभु की इच्छानुसार ही वे काल के अधीन है और उसकी इच्छानुसार वे सत्यस्वरूप परमात्मा में विलीन हो जाते हैं।

39हे नानक ! जो कुछ भी प्रभु को लुभाता है, वही होता है। सांसारिक जीवों के वश में कुछ भी नहीं ॥८॥४॥

40श्रीरागु महला १ ॥

41यदि मन में जूठन है तो तन में भी जूठन आ जाती है और जूठन के कारण जिव्हा भी जूठी हो जाती है। अर्थात् विषय-विकारों में लीन होने के कारण तन-मन-जिव्हा मलिन हो जाती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं