गुरु ग्रंथ साहिब 558 · Raag Vadhans · Guru Nanak Dev Ji
1तेरे पास न तो चूड़ियाँ पहनाने वाला मनिहार है, न ही सोने की चूड़ियाँ हैं और न ही कांच की चूड़ियाँ हैं।
2जो बांहें पति-प्रभु के गले के साथ नहीं लगती, वे बांहें जलन में जल जाती हैं।
3मेरी सभी सखियाँ अपने पति-प्रभु के साथ आनंद करने के लिए गई हैं किन्तु मैं तुच्छ बदनसीब किसके द्वार पर जाऊँ ?
4हे मेरी सखी ! अपनी तरफ से तो मैं बहुत ही शुभ आचरण वाली हूँ किन्तु मेरे उस पति-परमेश्वर को मेरा एक भी शुभ कर्म भला नहीं लगता।
5अपने बालों को संवारकर मैं चोटियाँ करती हूँ और अपनी माँग में सिंदूर भर लेती हूँ।
6परन्तु जब मैं अपने पति-परमेश्वर के समक्ष जाती हूँ तो स्वीकार नहीं होती और अत्यंत शोक में मर जाती हूँ।
7मैं पीड़ित होकर विलाप करती हूँ तो सारी दुनिया भी रोती है और मेरे साथ वन के पक्षी भी विलाप करते हैं।
8परन्तु एक मेरे तन की जुदा हुई आत्मा ही विलाप नहीं करती, जिसने मुझे मेरे प्रियतम से जुदा कर दिया है।
9वह मेरे स्वप्न में मेरे पास आया भी और फिर चला गया, जिसके विरह के दु:ख में मैं अश्रु भर कर रोई।
10हे मेरे प्रियतम ! मैं तेरे पास नहीं आ सकती, न ही मैं किसी को भेज सकती हूँ।
11हे मेरी भाग्यशालिनी निद्रा ! आओ, शायद मैं अपने उस स्वामी को पुनः स्वप्न में देख सकूं।
12नानक का कथन है कि जो मुझे मेरे मालिक की बात सुनाएगा, उसे मैं क्या भेट दूँगा ?
13अपने सिर को काटकर मैं उसे बैठने हेतु आसन पेश करूँगा तथा सिर के बिना ही उसकी सेवा करूँगा।
14मैं क्यों नही प्राण त्याग देती और अपना जीवन क्यों नहीं देती, जबकि मेरा पति-परमेश्वर किसी दूसरे का हो चुका है॥ १॥ ३॥
15वडहंसु महला ३ घरु १
16ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
17यदि जीव का मन मैला है तो सबकुछ मलिन है; शरीर को धोकर शुद्ध करने से मन निर्मल नहीं होता।
18यह दुनिया भ्रम में भूली हुई है किन्तु कोई विरला ही इस सत्य को बूझता है॥ १॥
19हे मेरे मन ! तू एक परमेश्वर के नाम का जाप कर,
20चूंकि सतिगुरु ने मुझे यही नाम-भण्डार दिया है॥ १॥ रहाउ॥
21यदि प्राणी सिद्ध महापुरुषों के आसन लगाना सीख ले तथा अपनी इन्द्रियों को काबू रखने का अभ्यास करे तो
22भी मन की मैल दूर नहीं होती और न ही उसकी अहंकार रूपी मलिनता निवृत्त होती है॥ २॥
23सच्चे गुरु की शरण के बिना इस मन को किसी अन्य साधन द्वारा पावन नहीं किया जा सकता।
24सतिगुरु से भेंट करने से मन का दृष्टिकोण बदल जाता है और कुछ कथन नहीं किया जा सकता ॥ ३॥
25नानक का कथन है कि यदि कोई जीव सतिगुरु से भेंट करके सांसारिक विषय-विकारों से तटस्थ होकर मर जाए और गुरु के शब्द द्वारा फिर जीवित हो जाए तो
26उसकी सांसारिक मोह-ममता की मैल दूर हो जाती है और उसका यह मन निर्मल हो जाता है ॥४॥१॥
27वडहंसु महला ३ ॥
28भगवान की कृपा-दृष्टि द्वारा ही सतगुरु की सेवा हो सकती है और उसकी करुणा से ही सेवा होती है।
29उसकी करुणा-दृष्टि से यह मन वश में आता है और उसकी कृपा-दृष्टि से ही मन पावन होता है॥ १॥
30हे मेरे मन ! हमेशा ही सच्चे प्रभु को याद करते रहो।
31यदि तू एक परमेश्वर का नाम-स्मरण करेगा तो तुझे सुख की उपलब्धि होगी और तुझे फिर कदापि दुःख नहीं होगा ॥ १॥ रहाउ॥
32भगवान की कृपा-दृष्टि से ही प्राणी मोहमाया से तटस्थ होकर मर कर पुनः जीवित हो जाता है और उसकी कृपादृष्टि से ही प्रभु-शब्द आकर मन में निवास कर लेता है।
33उसकी कृपा-दृष्टि द्वारा उसका हुक्म समझा जाता है और जीव उसके हुक्म में समाया रहता है।॥२॥
34जिस जिह्म ने हरि-रस को नहीं चखा, वह जल जानी चाहिए।
35यह दूसरे रसों के स्वाद में लगी हुई है और द्वैतभाव में फँसकर दुःख प्राप्त करती है॥ ३॥
36एक ईश्वर की सभी जीवों पर कृपा-दृष्टि एक समान ही है परन्तु कोई नेक बन जाता है और कोई बुरा बन जाता है, यह अन्तर भी प्रभु स्वयं ही बनाता है।
37हे नानक ! सतगुरु को मिलने से ही फल प्राप्त होता है और जीव को गुरु द्वारा नाम से ही प्रशंसा प्राप्त होती है॥ ४॥ २ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं