सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 556 · Raag Bihaagraa · Guru Amar Daas Ji

1जब तक शरीर में प्राण होते हैं, तब तक मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता।

2फिर आगे परलोक में पहुँच कर क्या करेगा ? जो व्यक्ति ज्ञानवान है, वह चेतन होता है लेकिन अज्ञानी व्यक्ति अन्धे कर्मों में ही क्रियाशील रहता है।

3हे नानक ! इहलोक में मनुष्य जो भी कर्म करता है, वही मिलता है तथा परलोक में जाकर वही प्राप्त होता है॥ १॥

4मः ३ ॥

5आदि से ही परमात्मा का अटल हुक्म है कि सच्चे गुरु के बिना उसका नाम-सुमिरन नहीं हो सकता।

6सच्चा गुरु मिल जाए तो मनुष्य अपने मन में ही परमात्मा को व्यापक अनुभव करता है और हमेशा ही उसकी सुरति में समाया रहता है।

7श्वास-श्वास से सर्वदा वह उसे याद करता है और उसका कोई भी श्वास व्यर्थ नहीं जाता।

8भगवान का नाम याद करने से उसका जीवन-मृत्यु का आतंक नाश हो जाता है और वह अटल जीवन पदवी प्राप्त कर लेता है।

9हे नानक ! परमात्मा यह अमर पदवी उसे ही प्रदान करता है, जिसे अपनी रज़ा से कृपा धारण करता है॥ २ ॥

10पउड़ी ॥

11परमात्मा आप ही सर्वज्ञाता, त्रिकालदर्शी और आप ही प्रधान है।

12वह आप ही अपने रूप का दर्शन करवाता है और आप ही मनुष्य को ध्यान-मनन में लगा देता है।

13वह आप ही मौनावस्था में विचरन करता है और आप ही ब्रह्म-ज्ञान का कथन करता है।

14वह किसी को कड़वा नहीं लगता और सभी को भला लगता है।

15उसकी महिमा-स्तुति वर्णन नहीं की जा सकती और मैं उस पर सर्वदा कुर्बान जाता हूँ॥ १६॥

16श्लोक महला १॥

17कलियुग में (नाम विहीन इन्सान) धरती में भूत-पिशाच ही पैदा हुए हैं।

18पुत्र प्रेत है, पुत्री चुडैल और जोरू (पत्नी) इन प्रेत-चुडैलों की मालकिन है॥ १॥

19महला १॥

20हिन्दुओं ने तो मूल रूप से परमात्मा को विस्मृत ही कर दिया है और कुमार्गगामी होते जा रहे हैं।

21जैसे नारद मुनि ने कथन किया है वैसे ही मूर्ति-पूजा कर रहे हैं। वे अन्धे, गूंगे एवं अन्धों के भी महा अंधे अन्धकार में अंधे हो चुके हैं।

22वे मूर्ख तथा गंवार पत्थरों की मूर्तियाँ लेकर उनकी पूजा करते हैं।

23वे पत्थर जब स्वयं ही डूब जाते हैं, वे तुझे कैसे भवसागर से पार करवा सकते हैं ? ॥ २ ॥

24पउड़ी ॥

25हे मालिक ! सबकुछ तेरे वश में है और तू ही एक सच्चा साहूकार है।

26तेरे भक्तजन केवल तेरी ही प्रेमा-भक्ति में रंगे हुए हैं और एक तुझ पर ही उनकी पूर्ण आस्था है।

27हरिनामामृत ही उनका भोजन है, जिसे पेट भर-भर कर भक्तजन खाते रहते हैं।

28परमात्मा का सिमरन ही सच्चा लाभ है, जिससे सभी पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं।

29नानक का कथन है कि जो हरि अगम्य एवं अनन्त है, उस परब्रह्म-प्रभु को संतजन ही प्रिय लगते हैं।॥ २०॥

30श्लोक महला ३॥

31सब कुछ परमात्मा के हुक्म अनुसार ही आता है और उसके हुक्म में ही सब कुछ चला जाता है।

32यदि कोई मूर्ख अपने आपको ही करने वाला जानता है तो वह अन्धा ही है और अन्धे कर्म ही कर रहा है।

33हे नानक ! कोई विरला गुरुमुख ही परमात्मा के हुक्म को समझता है, जिस पर वह अपनी रज़ा से कृपा करता है॥ १॥

34महला ३॥

35जिसे गुरु के माध्यम से परमात्मा का नाम प्राप्त हुआ है, वही असल में योगी है और उसे ही सच्ची योग युक्ति प्राप्त होती है।

36उस योगी के देहि रूपी नगर में सर्व प्रकार के गुण निवास करते हैं किन्तु योगी का वेष धारण करने से सच्चा योग प्राप्त नहीं होता।

37हे नानक ! ऐसा विरला ही कोई योगी है, जिसके अन्तर्मन में परमात्मा प्रगट होता है॥ २ ॥

38पउड़ी।

39भगवान ने खुद ही जीव उत्पन्न किए हैं और खुद ही उन सबका आधार है।

40वह आप ही सूक्ष्म रूप में दिखाई देता है और आप ही उसका विश्व में प्रसार नजर आता है।

41वह आप ही अकेला विचरन करता रहता है और आप ही दुनिया रूपी बड़े कुटुंब वाला है।

42नानक तो परमात्मा के संतों की चरण-धूलि का ही दान माँगता है।

43हे परमेश्वर ! तू ही जीवों को देने वाला है और तेरे सिवाय मुझे अन्य कोई भी दाता नजर नहीं आता॥ २१॥ १॥ शुद्ध ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं