सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 555 · Raag Bihaagraa · Guru Amar Daas Ji

1हे निरंजन परमेश्वर ! जो भी तेरी महिमा-स्तुति करता है एवं जिस पर तू कृपा के घर में आता है, वह सबकुछ प्राप्त कर लेता है।

2हे भगवान! वास्तव में वही साहूकार और सत्य का व्यापारी है, जो तेरे नाम-धन का सौदा लाद लेता है।

3हे संतजनो ! उस परमात्मा का स्तुतिगान करो, जिसने द्वैतभावना की ढ़ेरी को ध्वस्त कर दिया है | १६ ॥

4श्लोक ॥

5हे कबीर ! यह जगत मरता मरता मर गया है किन्तु असल में कोई भी इंसान मरने का तरीका नहीं जानता।

6जो जीव ऐसी वास्तव मृत्यु मरता है, वह बार-बार नहीं मरता ॥ ५॥

7महला ३।

8हमें यह ज्ञान भी नहीं है कि हम किस प्रकार मरेंगे ? हमारी किस प्रकार की मृत्यु होगी?

9यदि मालिक हृदय से विस्मृत न हो तो हमारी मृत्यु सुगम होगी।

10सारी दुनिया मरने से डरती है और हरेक जीव जीने की ही आशा करता है।

11गुरु की कृपा से जो व्यक्ति जीवित ही प्राण त्याग देता है, वह परमात्मा के हुक्म को बूझता है।

12हे नानक ! जो व्यक्ति ऐसी मृत्यु मरता है, तो वह सर्वकाल ही जीवित रहता है।

13पउड़ी।

14जब हरि स्वामी आप कृपालु हो जाता है तो वह स्वयं ही अपना नाम प्राणियों से जपाता रहता है।

15हरि आप ही सतिगुरु से मिलाप करवाकर सुख प्रदान करता है और अपना सेवक उसे आप ही अच्छा लगता है |

16वह आप ही अपने सेवको की लाज प्रतिष्ठा रखता है और जीवों को अपने भक्तों के चरण-आश्रय में डाल देता है।

17धर्मराज जो हरि-परमेश्वर ने बनाया हुआ है, यह (यमराज) भी हरि के भक्तो व् सेवकों के निकट नहीं आता।

18जो हरि का प्यारा है, वह सब लोगों का प्यारा है, अन्य कितने ही जीव व्यर्थ ही दुनिया में जन्मते-मरते रहते हैं। १७॥

19श्लोक महला ३।

20सारी दुनिया राम-राम पुकारती रहती है किन्तु राम ऐसे प्राप्त नहीं होता।

21वह अगम्य, अगोचर, बहुत महान एवं अतुलनीय है और उसके गुणों की तुलना नहीं की जा सकती।

22उसका मूल्यांकन भी नहीं किया जा सकता और किसी मूल्य से भी वह खरीदा नहीं जा सकता।

23केवल गुरु के शब्द द्वारा उसका भेद पाया जा सकता है, इस विधि से वह आकर जीव के मन में निवास कर लेता है।

24हे नानक ! राम अपरिमित है और गुरु की कृपा से चित्त में समाया रहता है।

25वह आप ही आकर मनुष्य को मिलता है और मिलकर मिला रहता है। १॥

26महला ३ ॥

27हे मन ! यह परमात्मा का नाम ऐसा धन है, जिससे सर्वदा सुख ही उपलब्ध होता है।

28इससे कदापि न्यूनता नहीं आती और मनुष्य को हमेशा लाभ ही मिलता है।

29इसे खाने एवं खर्च करने से न्यूनता नहीं आती, क्योकि परमात्मा सर्वदा ही देता रहता है।

30मनुष्य को बिल्कुल ही उसकी चिंता नहीं होती और कदापि हानि भी नहीं होती।

31हे नानक ! जिस पर परमात्मा कृपा-दृष्टि धारण करता है, उसे गुरु के माध्यम से नाम-धन प्राप्त हो जाता है। २।

32पउड़ी ॥

33परमात्मा स्वयं ही सभी के हृदय में मौजूद है और बाहर भी जग में स्वयं ही मौजूद है।

34वह आप ही गुप्त रूप में विचरन करता है और आप ही सबके अन्तर्मन में प्रत्यक्ष है।

35उस करतार ने स्वयं ही छतीस युगों तक घोर अन्धकार किया और शून्यावस्था में निवास करता रहा।

36वहाँ तब वेद, पुराण एवं शास्त्र इत्यादि नहीं थे तथा लोगों का राजा परमेश्वर आप ही था।

37सभी से तटस्थ होकर वह आप ही शून्य-समाधि लगाकर बैठा था।

38अपनी विस्तार सीमा वह स्वयं ही जानता है और आप ही गहरा समुद्र है॥ १८॥

39श्लोक महला ३॥

40समूचा विश्व अहंकार में मरा हुआ है और बार-बार मृत्यु को ही प्राप्त होता जा रहा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं