गुरु ग्रंथ साहिब 553 · Raag Bihaagraa · Guru Amar Daas Ji
1जिन लोगों को तुम गुरुमुख की बड़ाई प्रदान करते हो, वे तेरे सच्चे दरबार में विख्यात हो जाते हैं। ११ ॥
2श्लोक मरदाना १॥
3यह कलियुग कामवासना की मदिरा से भरा हुआ मदिरालय है, जिसे मन पीने वाला है।
4क्रोध का कटोरा मोह से भरा हुआ है, जिसे अहंकार पिलाने वाला है।
5झूठे लोभ की महफिल में कामवासना की मदिरा पी-पीकर जीव बर्बाद हो रहा है।
6इसलिए हे जीव ! शुम कर्म तेरा पात्र और सत्य तेरा गुड़, इससे तू सत्यनाम की श्रेष्ठ मदिरा बना।
7गुणों को अपनी रोटी, शीलता को अपना घी तथा लज्जा को खाने हेतु अपना मांसाहार बना।
8हे नानक ! ऐसा भोजन गुरुमुख बनने से ही प्राप्त होता है, जिसे खाने से सभी पाप-विकार मिट जाते हैं॥ १॥
9मरदाना १ ॥
10मनुष्य का तन एक घड़ा है, अहंत्व मदिरा है और तृष्णा की एक महफिल है।
11मन के मनोरथों - वासनाओ को कटोरी झूठ से भरपूर है और यमदूत कटोरी पिलाने वाला है।
12हे नानक ! इस मदिरा को पीने से जीव अत्याधिक पाप-विकार कमा लेता है।
13ब्रह्म-ज्ञान को अपना गुड़, प्रभु-भजन को अपनी रोटी तथा प्रभु-भय को खाने के लिए अपना मांसाहार बना।
14हे नानक ! यह भोजन ही सत्य है, जिससे सत्यनाम ही मनुष्य के जीवन का आधार बनता है॥ २ ॥
15यदि यह शरीर घड़ा हो, आत्म-ज्ञान की मदिरा हो तो नामामृत उसकी धारा बन जाती है।
16यदि सत्संगति से मिलाप हो, प्रभु में सुरति की कटोरी जो नामामृत से भरी हुई है, उसे पी-पीकर पाप-विकार मिट जाते हैं । 3।
17पउड़ी।
18परमात्मा स्वयं ही देवता, मानव, गण तथा गंधर्व है और स्वयं ही षड्दर्शन की बड़ी है।
19वह स्वयं ही शिवशंकर महेश है और स्वयं ही गुरमुख बनकर अकथनीय कहानी वर्णन करता है
20वह स्वयं योगी स्वयं ही भोगी तथा स्वयं ही सन्यासी बनकर वनो में भ्रमण करता है।
21परमात्मा अपने साथ ही ज्ञान-गोष्ठी करता है, स्वय ही उपदेश देता रहता है और स्वयं ही सुघड़ सुन्दर स्वरूप एवं विद्वान है।
22वह स्वयं ही अपनी जगत लीला रचकर स्वयं ही देखता रहता है और स्वयं ही सभी जीवों का ज्ञाता है। १२।
23श्लोक महला ३ ॥
24वही संध्या की प्रार्थना स्वीकार है, जिस द्वारा मेरा हरि-प्रभु मन में याद आता हो।
25इससे परमेश्वर के साथ प्रीति उत्पन्न होती है और यह माया के मोह को नष्ट कर देती है।
26गुरु की कृपा से दुविधा का नाश हो जाता है, मन स्थिर हो जाता है और प्रभु-स्मरण को मनुष्य अपनी संध्या की प्रार्थना बना लेता है।
27हे नानक! जो स्वेछाचारी मनुष्य संध्या की प्रार्थना तो करते हैं,पर उनका चित्त स्थिर नहीं होता जिससे वे जन्म मरण के चक्र में फंसकर विनिष्ट होते रहते है ॥ १॥
28महला ३ ॥
29प्रिय प्रिय पुकारती हुई में समूचे जगत में भ्रमण करती रही किन्तु मेरी प्यास नहीं बुझी।
30हे नानक ! सतिगुरु को मिलकर मेरी प्यास बुझ गई है और अपने प्रिय-प्रभु को हृदय रूपी घर में ही पा लिया है ॥२॥
31पउड़ी ॥
32परमात्मा आप ही तत्य है और आप ही समस्त तत्वों का परम तत्त्व है, वह स्वयं ही मालिक है और स्वयं ही सेवक है।
33उसने स्वयं ही संसार के अठारह वर्गों को उत्पन्न किया है और स्वयं ही रचयिता ब्रह्मा है, जो अपनी हकूमत चला रहा है।
34यह खुद ही सबको मारता है, खुद ही मुक्त करता है और खुद ही दयावृष्टि धारण करके क्षमा प्रदान करता है।
35वह अचूक है और कदापि भूलता नहीं, सच्चे प्रभु का न्याय सम्पूर्णतया सत्य है तथा वह सत्य में ही विद्यमान है।
36जिन गुरुमुखों को वह स्वयं ज्ञान प्रदान करता है, उनके अन्तर्मन से दुविधा एवं भ्रम निवृत्त हो जाते हैं। १३ ॥
37श्लोक महला ५ ॥
38जो संतों की सभा में परमात्मा का नाम याद नहीं करते, ये शरीर धूलि की भांति उड़ जाते है।
39हे नानक ! उस रसहीन देह को धिक्कार है, जो उस परमात्मा को नहीं जानती, जिसने उसे बनाया है॥ १ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं