गुरु ग्रंथ साहिब 549 · Raag Bihaagraa · Guru Amar Daas Ji
1स्वेच्छाचारी जीव आदि काल से ही कुमार्गगामी हुआ है, चूंकि उसके अंदर लालच, लोभ एवं अहंकार भरा हुआ है।
2झगड़ा करते हुए ही उसके रात-दिन गुजर जाते हैं और वह शब्द का चिंतन नहीं करता।
3रचयिता प्रभु ने उसकी शुद्ध बुद्धि छीन ली है, सो उसके सभी वचन विकारों से भरे हुए होते हैं।
4ऐसे लोगों को चाहे जितना भी दे दिया जाए, वे संतोषवान नहीं होते, क्योंकि उनके अन्तर्मन में तृष्णा तथा अत्याधिक अज्ञान का अंधकार होता है।
5हे नानक ! इन स्वेच्छाचारी जीवों से तो संबंधविच्छेद ही भला है, जिन्हें माया-मोह से भरपूर प्रेम है ॥१॥
6महला ३।
7जिन सेवकों का सतगुरु करतार रखवाला है, उन्हें भय एवं संशय क्या प्रभावित कर सकते हैं?
8आदिकाल से आप ही रक्षक परमात्मा उनकी लाज बचाता रहा है।
9वे सच्चे शब्द का चिंतन करते है और अपने प्रियतम से मिलकर सुख की अनुभूति करते है।
10है नानक ! हमने उस सुखदाता परमात्मा की उपासना की है, जो आप ही परख करने वाला (पारखी) है।॥ २॥
11पउड़ी।
12हे ईश्वर ! यह सभी जीव-जन्तु तेरे ही हैं और तू इन सबकी पूंजी है।
13जिसे भी तू अपनी देन देता है, उसे सब कुछ मिल जाता है और तेरे बराबर का कोई प्रतिद्वन्दी नहीं।
14हे हरि ! इमारी तुझसे ही प्रार्थना है, तू ही सब जीवों का एक दाता है।
15जिसकी प्रार्थना तुझे अच्छी लगती है, तुम उसकी प्रार्थना मंजूर कर लेते हो और ऐसा भक्त बड़ा भाग्यशाली है।
16हे स्वामी ! हर जगह तेरा ही कौतुक हो रहा है, हम जीवों का दु:ख सुख तेरे ही सम्मुख है॥ २ ॥
17श्लोक महला ३ ॥
18गुरुमुख मनुष्य सच्चे परमात्मा को बहुत अच्छे लगते हैं एवं सत्य के दरबार में उन्हें सत्यवादी माना जाता है।
19ऐसे सज्जन के मन में आनंद बना रहता है वे हमेशा गुरु के शब्द पर विचार करते रहते हैं।
20वे अपने अन्तर्मन में शब्द को बसाते हैं, जिससे उनका दु:ख दूर हो जाता है और करतार उनके भीतर ज्ञान का प्रकाश कर देता है।
21हे नानक ! सारी दुनिया का रखवाला परमात्मा अपनी कृपा धारण करके उनकी रक्षा करता है॥ १॥
22महला ३ ॥
23गुरु की सेवा-चाकरी उसके भय में रहकर ही करनी चाहिए।
24जो अपने गुरु की रज़ा में चलता है, वह वैसा ही हो जाता है, जैसी वह सेवा करता है।
25है नानक ! परमात्मा आप ही सब कुछ है और उसके अलावा दूसरा कोई आश्रय-स्थल जाने के लिए नहीं है॥ २ ॥
26पउड़ी।
27हे ईश्वर! अपनी बड़ाई को तू खुद ही जानता है और तुझ जैसा बड़ा दूसरा कोई नहीं।
28तुझ जैसा अन्य बराबर का कोई हो तो हम कहें लेकिन तुझ जैसा बड़ा तू आप ही है।
29हे प्रभु! जिन्होंने भी तेरी उपासना की है, उन्हें सुख ही उपलब्ध हुआ है, अन्य कौन उसकी क्या बराबरी कर सकता है ?
30हे दाता, तू निर्माण एवं विनाश करने में सर्वशक्तिमान है और तेरे समक्ष सारी दुनिया हाथ जोड़कर माँगने हेतु खड़ी हुई है।
31तुझ जैसा दानवीर मुझे कोई नजर नहीं आता, तूने ही खण्डों, ग्रहाण्डों, पातालों, पुरियों, सभी लोकों तथा समस्त जीवों को दान प्रदान किया हुआ है॥३॥
32श्लोक महला ३।
33हे जीव ! यदि तेरे मन में प्रभु के प्रति आस्था नहीं तो सहजावस्था में तुम उससे स्नेह नहीं करते।
34तूने शब्द के स्वाद को प्राप्त नहीं किया, फिर मन के हठ से प्रभु का क्या यशोगान करोगे?
35हे नानक ! इस दुनिया में उस जीव का आगमन सफल है जो गुरुमुख बनकर सत्य में समा जाता है॥ १ ॥
36महला ३ ॥
37विमूढ जीव अपने आप (अहं) की पहचान नहीं करता किन्तु अन्य लोगों को मंदे वचनों द्वारा दुखी करता रहता है।
38विमूढ़ जीव का मूल स्वभाव नहीं बदला और परमात्मा से जुदा होकर वह दण्ड भोगता रहता है।
39सच्चे गुरु के भय द्वारा उसने अपने स्वभाव को बदलकर सुधार नहीं किया जिससे वह प्रभु की गोद में लीन हुआ रहे।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं