गुरु ग्रंथ साहिब 547 · Raag Bihaagraa · Guru Arjan Dev Ji
1नानक प्रार्थना है की है दीनदयाल गोविन्द! अपनी कृपा का हाथ रखकर मेरी रक्षा कीजिए।४ ॥
2वह दिन बड़ा शुम गिना जाता है जब परमात्मा से मिलन होता है।
3सभी सुख ऐश्वर्य प्रत्यक्ष हो गए है तथा दुःख मुझ से दूर हो गए हैं।
4नित्य ही जगतपालक गोपाल का गुणगान करने से सदैव सहज सुख एवं आनंद-विनोद की उपलब्धि होती है।
5संतों की सभा में शामिल होकर मैं प्रभु के नाम का भजन करता हैं, जिसके फलस्वरूप मुझे दोबारा योनियों में नहीं भटकना पड़ेगा।
6परमात्मा ने सहज-स्वभाव ही मुझे अपने गले से लगा लिया है और मेरे पूर्व जन्म के शुभ कर्मों का अंकुर अंकुरित हो गया है।
7नानक प्रार्थना करता है कि भगवान स्वयं ही मुझे मिल गया है और वह कदाचित मुझसे दोबारा दूर नहीं जाता ॥ ५ ॥ ४ ॥ ७॥
8बिहागड़ा महला ५ छंत ॥
9हे मेरे स्वामी ! मेरा निवेदन सुनो,
10हम जीवों में चाहे करोड़ों ही अपराध भरे हुए हैं किन्तु फिर भी हम तेरे ही सेवक हैं।
11हे दुःखनाशक ! हे कृपा करने वाले मोहन ! हे कलह-क्लेश के नाशक !
12हे सर्वव्यापक निरंजन ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, दया करके मेरी लाज प्रतिष्ठा रखे।
13प्रभु सभी को सुनता एवं देखता है, वह हम सभी के साथ है और निकट से अति निकट है।
14स्वामी ! नानक की प्रार्थना सुन लो और मुझे अपने घर के सेवक की तरह रख लो॥ १॥
15हे राम ! तू सदैव सर्वशक्तिमान है परन्तु हम जीव तो दीन भिखारी है।
16हे मुरारी प्रभु ! मैं माया के मोह में मग्न हूँ, दया करके मुझे माया से निकाल लीजिए।
17लोभ, मोह एवं विकारों में फंसकर मैंने अनेक दोष कमाए हैं।
18जीव अपने किए हुए शुभाशुभ कर्मों का फल भोगता रहता है।
19हे पतितपावन ! मुझ पर अनुग्रह करो, क्योंकि मैं अनेक योनियों में भटकता हुआ हार गया हूँ ।
20नानक प्रार्थना करता है कि मैं परमात्मा का सेवक हूँ और यह मेरी आत्मा एवं प्राणो का आधार है।॥ २ ॥
21है राम ! तू सर्वकला समर्थ एवं बहुत बड़ा है किन्तु मेरी बुद्धि बड़ी तुछ है,
22तू कृतघ्न जीवों का भी पालन पोषण करता है और सब जीवों पर तेरी पूर्ण कृपा-दृष्टि है।
23हे जग के रचयिता ! तू अपार है और तेरा ज्ञान अनन्त है किन्तु मैं नीच जीव कुछ भी नहीं जानता।
24मैं तो पशु समान विमूढ़ एवं नीच हूँ जो तेरे अमूल्य नाम-रत्न को त्याग कर कौड़ियाँ एकत्रित की हैं।
25हे प्रभु! मैंने दोष कर करके यह माया अर्जित की है, जो महा चंचल है और जीव को त्याग कर चली जाती है।
26नानक का कथन है कि हे सर्वकला समर्थ प्रभु! मैं तेरी शरण में हूँ, दया करके मेरी लाज रखो ॥ ३ ॥
27जिस परमात्मा से जुदा हुआ था, उसने स्वयं ही अपने साथ मिला लिया है।
28संतों की सभा में सम्मिलित होकर श्रीहरि का गुणगान किया है |
29उस जगतपालक की गुणस्तुति करने से कल्याणस्वरूप ईश्वर प्रत्यक्ष हो गया है।
30प्रभु के संग मेरी हृदय-सेज सुहावनी हो गई है और उसने मुझे अपना बना लिया है।
31मैं चिन्ता को त्याग कर निश्चित हो गया हूँ और मैंने पुनः कोई दु:ख प्राप्त नहीं किया |
32नानक कथन है की वह तो परमात्मा के दर्शन करके ही जीवित रहता है एवं गुणों के भण्डार प्रभु का यशोगान करता रहता है ॥ ४ ॥ ५ ॥ ८ ॥
33बिहागड़ा महला ५ छंत ॥
34हे सुधर्मी मानव जीव ! बोल, क्यों मौन धारण किया हुआ है ?
35अपने नेत्रों से तूने माया का व्यव्हार करने वाले देख लिए है जो सभी नाशवान है।
36है मानव जीव ! गोविन्द के नाम के अतिरिक्त तेरे साथ कुछ भी नहीं जाना।
37देश, वस्त्र, स्वर्ण तथा चांदी ये सभी कार्य व्यर्थ हैं।
38पुत्र, पत्नी, दुनिया की शोभा जीव का साथ नहीं देते एवं हाथी-घोड़े तथा अन्य आकर्षण विकारों की तरफ प्रेरित करते रहते है।
39नानक प्रार्थना करता है कि संतो की संगति के बिना सारा जगत मिथ्या है ॥ १ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं