गुरु ग्रंथ साहिब 546 · Raag Bihaagraa · Guru Arjan Dev Ji
1हे जीव ! हरि अमृत का सरोवर है, उस हरिनामामृत का पान करो।
2संतजनों की सभा में ही परमेश्वर मिलता है और उसकी आराधना करने से सभी कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं।
3वह सभी कार्य सम्पूर्ण करने वाला तथा दुःखों का विदीर्ण करने वाला है, इसलिए अपने मन में हमें उसे एक पल भी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
4सर्वगुणसम्पन्न जगदीश्वर रात-दिन आनंद में तथा सदा सत्यस्वरूप है,
5वह ठाकुर अनंत, सर्वोच्च तथा अपार है, जिसका धाम अगम्य है।
6नानक प्रार्थना करता है कि मेरी मनोकामना पूर्ण हो गई है, क्योंकि मुझे ईश्वर मिल गया है।। ३।।
7प्रभु का यश सुनने एवं गाने वालों को कई करोड़ यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
8परमात्मा के नाम का जाप करने वालों की सारी वंशावलि ही संसार-सागर से पार हो जाती है।
9हरि के नाम का जाप करने से प्राणी शोभावान बन जाता है, जिसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।
10हे प्राण प्यारे परमेश्वर ! मैं तुझे नहीं भुला सकता क्योंकि मेरे मन को सदैव ही तेरे दर्शनों की अभिलाषा बनी रहती है।
11वह बड़ा शुभ दिवस आया है, जब सर्वोच्च, अगम्य एवं अपार प्रभु ने अपने गले से हमें लगाया है।
12नानक प्रार्थना करता है कि जब अत्यंत प्रिय प्रभु मिल जाता है,सबकुछ सफल हो जाता है। ४॥ ३॥ ६॥
13बिहागड़ा महला ५ छंत ॥
14हे मानव जीव ! क्यों निरर्थक पदार्थो के मोह में फंसे हुए हो ? क्योकि यह जीवन मार्ग बड़ा मुश्किल है।
15हे पाप कमाने वाले ! दुनिया में तेरा कोई भी साथी नहीं।
16यदि कोई भी तेरा साथी नहीं होगा तो अपने किये कर्मो पर सदा पष्चाताप ही करता रहेगा।
17तू अपनी रसना से दुनिया के मालिक गोपाल के गुणों का जाप नहीं करता यह जीवन का शुभावसर दोबारा फिर तुझे कब मिलेगा?
18जिस प्रकार वृक्ष से टूटे हुए पत्ते पुनः वृक्ष से नहीं जुड़ सकते, वैसे ही जीवात्मा मृत्यु के मार्ग पर अकेले ही चल देती है।
19नानक प्रार्थना करता है कि हरि के नाम के बिना जीवात्मा सदैव ही दुःख संताप में भटकती रहती है।॥१॥
20हे जीव ! तू छिप-छिपकर बड़े छल कपट करता रहता है किन्तु प्रभु सब कुछ जानता है।
21जब परलोक में धर्मराज तेरे कर्मों का लेखा-जोखा करेगा तो दुष्कर्मों के कारण तुम तिलों की भाँति घानी में पिसे जाओगे।
22हे नश्वर प्राणी ! अपने किए हुए कर्मों का दु:ख रूपी दण्ड तुझे भोगना ही पड़ेगा तथा तुम अनेक योनियों के चक्र में पड़कर भटकते रहोगे।
23महा मोहनी के आकर्षण में फंसकर प्राणी अपना हीरे जैसा अनमोल मनुष्य जीवन गंवा देता है।
24एक परमेश्वर के नाम के अतिरिक्त जीवात्मा सभी कार्यों में कुशल एवं चतुर है।
25नानक प्रार्थना करता है कि जिनके कर्म-लेख में ऐसा लिखा हुआ है, यह दुविधा तथा सांसारिक मोह में लीन रहते हैं।॥२॥
26कृतघ्न मनुष्य परमेश्वर से जुदा ही रहता है और कोई भी उसका मध्यस्थ नहीं होता।
27कठिन यमदूत आकर उसे पकड़ लेते है और
28उसके दुष्कर्मो के परिणामस्वरुप यमदूत उसे आगे लगा लेते है, क्योकि वह महामोहनी में लीन रहा था।
29जो मनुष्य गुरमुख बनकर परमात्मा का गुणगान नहीं करता, वह तपते हुए स्तम्भ से लगा दिया जाता है।
30जीव काम, क्रोध एवं अहंकार में लीन होकर सबकुछ गंवा देता है और ज्ञान से विहीन होकर पश्चाताप करता रहता है।
31नानक प्रार्थना करता है कि कर्मो के फलस्वरूप ही मनुष्य संयोग कारन प्रभु को विस्मृत करके कुमार्गगामी बना है, इसलिए यह अपनी रसना से श्रीहरि के नाम का जाप नहीं जपता ॥३॥
32है प्रभु ! तेरे सिवाय हमारा कोई भी रखवाला नहीं हैं।
33है श्रीहरि ! पतित लोगो का उद्धार करना तेरा विरद है।
34हे पतितों का उद्धार करने वाले स्वामी ! हे कृपानिधि ! हे दया के घर ! मैं तेरी शरण में (आया) हूँ।
35हे जगत के रचयिता ! मेरा नश्वर जगत रूपी अन्धकूप से उद्धार करो तू सब जीवों का भरण-पोषण करने वाला है।
36मैं तेरी शरण में आया हूँ कृपा करके मेरी सांसारिक महा बेड़ियाँ काट दीजिये और नाम का आधार प्रदान कीजिये।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं