सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 542 · Raag Bihaagraa · Guru Arjan Dev Ji

1जिस ने पृथ्वी की रचना की है, उसने ही जीवों के जन्म-मरण का चक्र नियत किया हुआ है।

2परमात्मा कुछ जीवों को सतगुरु से मिलाकर उन्हें अपने दरबार में बुला लेता है, किन्तु कई जीव दुविधा में फँसकर भटकते रहते हैं।

3हे दुनिया के मालिक ! अपना अन्त केवल तू ही जानता है, तू समस्त जीवों में समाया हुआ है।

4हे संतजनों ! ध्यानपूर्वक सुनो, नानक सत्य ही कहता है कि ईश्वर धर्म अनुसार न्याय में क्रियाशील है॥ १॥

5हे मेरी सखियो, आकर मुझे मिलो, ताकि हम मिलकर परमेश्वर के नाम की आराधना करें।

6हे मेरे प्यारे ! आओ, हम मिलकर पूर्ण सतिगुरु की सेवा करें तथा यम का मार्ग संवार लें।

7गुरुमुख बनकर इस विषम मार्ग को सहज बनाकर हम परमेश्वर के दरबार में शोभा प्राप्त करें।

8जिनके लिए विधाता ने जन्म से पूर्व प्रारम्भ से ही ऐसा लेख लिख दिया है, वे रात-दिन उससे वृति लगाते हैं।

9जब प्राणी संतों की सभा में शामिल हो जाता है तो उसके अहंकार, ममता एवं मोह का नाश हो जाता है।

10सेवक नानक कहता है कि जो जीव परमेश्वर के नाम की आराधना करता है, वह संसार-सागर से मुक्त हो जाता है।॥ २॥

11हे संतजनो ! आओ हम इकट्ठे होकर हाथ जोड़कर अविनाशी परमात्मा की पूजा करें।

12हे मेरे प्यारे ! मैंने पूजा करने की अनेक प्रकार की विधि की खोज की है किन्तु सच्ची पूजा यही है कि हम अपना यह मन-तन सब कुछ उसे अर्पण कर दें।

13यह मन, तन, धन सभी प्रभु के हैं, फिर कोई पूजा के तौर पर उसे क्या भेंट कर सकता है?

14जिस पर दुनिया का स्वामी हरेि कृपालु तथा दयालु होता है, वही जीव उसकी गोद में लीन होता है।

15जिसके मस्तक पर ऐसा भाग्य लिखा होता है, उसका गुरु के साथ स्नेह हो जाता है।

16नानक कथन करता है कि आओ हम संतों की सभा में मिलकर परमेश्वर के नाम की पूजा करें ॥ ३॥

17हे मेरे प्यारे ! हम दस-दिशाओं में प्रभु की खोज करते रहें किन्तु वह तो हमारे हृदय-घर में ही प्राप्त हो गया है।

18पूज्य हरि ने मानव-शरीर को ही हरि-मंदिर बनाया हुआ है, जिसमें वह निवास कर रहा है।

19जगत का स्वामी हरि ही सभी जीवों में समाया हुआ है और वह गुरु द्वारा मेरे हृदय-घर में प्रगट हो गया है।

20मेरे मन में से अज्ञानता का अंधकार मिट गया है और दुःख-क्लेश भाग गए हैं और अमृत जैसा मीठा हरि-रस टपकने लग गया है।

21जहाँ-कहीं भी देखता हूँ, उधर ही परब्रह्म स्वामी सर्वव्यापक है।

22नानक का कथन है कि सतिगुरु ने मुझे परमात्मा से मिला दिया है, जिसे मैंने अपने हृदय-घर में ही पा लिया है॥ ४॥ १॥

23रागु बिहागड़ा महला ५ ॥

24मेरा भगवान बहुत प्यारा, मन को मुग्ध करने वाला, सब शरीरों में शोभा देने वाला तथा सब के प्राणों का आधार है।

25उस दयालु लाल गोपाल की बड़ी सुन्दर शोभा है, जो अपरंपार है।

26हे दयालु गोपाल ! हे प्रियतम गोबिन्द ! हे पति-परमेश्वर ! मुझ विनीत जीव-स्त्री को भी दर्शन दीजिए।

27मेरे नेत्र तेरे दर्शन-दीदार हेतु तरस रहे हैं, मेरी जीवन रूपी रात्रि व्यतीतं होती जा रही है किन्तु मुझे नींद नहीं आती।

28मैंने ज्ञान का सुरमा अपने नेत्रों में लगाया है औरं प्रभु के नाम को अपना भोजन बनाया है, इस प्रकार सभी श्रृंगार किए हुए हैं।

29नानक संतों के चरण स्पर्श करता है एवं प्रार्थना करता है कि मुझे पति-परमेश्वर से मिला दो॥ १॥

30जब तक मेरा परमेश्वर नहीं मिलता, तब तक लोगों के लाखों उलाहने सहन करने पड़ते हैं।

31मैं प्रभु-मिलन हेतु उपाय करता हूँ किन्तु मेरा कोई भी उपाय सार्थक नहीं होता।

32यह धन-सम्पति नश्वर है, प्रिय प्रभु के बिना किसी विधि से भी मुझे धैर्य नहीं मिलता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं