सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 541 · Raag Bihaagraa · Guru Raam Daas Ji

1नानक ने अपने पूर्ण गुरु की श्रद्धा से सेवा की है, हे मेरी आत्मा ! जिसने सभी को लाकर उसके चरणों में डाल दिया है॥ ३॥

2हे मेरी आत्मा ! सो नित्य ही ऐसे परमेश्वर की भक्ति करनी चाहिए, जो सभी जीवों का बड़ा मालिक है।

3जो लोग एक मन से एक परमात्मा की आराधना करते हैं, वे किसी भी व्यक्ति के मोहताज नहीं होते।

4गुरु की सेवा करने से हरि का मन्दिर (आत्मस्वरूप) प्राप्त हो जाता है,

5हे मेरी आत्मा ! उन्होंने ही हरि-नाम का चिंतन किया है, जिनके मस्तक पर जन्म से पूर्व प्रारम्भ से ही परमेश्वर ने लेख लिख दिया है॥ ४ ॥ ५ ॥

6बिहागड़ा महला ४ ॥

7हे मेरे हरि-प्रभु ! सभी जीव तेरे पैदा किए हुए हैं और सब के भीतर तू ही मौजूद है, ये जीव जो भी कर्म करते हैं, इस संबंध में तू सबकुछ जानता है।

8हे मेरी आत्मा ! हरि भीतर एवं बाहर सभी के साथ है तथा सबकुछ देखता है किन्तु अज्ञानी मानव अपने मन में किए पाप कर्मों से मुकर जाता है।

9हे मेरी आत्मा ! स्वेच्छाचारी लोगों से भगवान दूर ही रहता है तथा उनका तमाम परिश्रम निष्फल हो जाता है।

10हे मेरी आत्मा ! नानक ने गुरुमुख बनकर हरि की आराधना की है तथा वह हरि को हर तरफ प्रत्यक्ष ही देखता है॥ १॥

11हे मेरी आत्मा ! वही सच्चे भक्त तथा सेवक हैं जो मेरे प्रभु के चित्त को लुभाते हैं।

12हे मेरी आत्मा ! हरि के दरबार में ऐसे सच्चे भक्तों एवं सेवकों को प्रतिष्ठा का वस्त्र पहनाया जाता है और वे रात-दिन सत्य में ही समाए रहते हैं।

13हे मेरी आत्मा ! उनकी संगति में रहने से विकारों की मैल उतर जाती है, जो प्राणी परमेश्वर के प्रेम-रंग में रंग जाता है और उस पर उसकी कृपा का चिन्ह अंकित हो जाता है।

14हे मेरी आत्मा ! नानक की प्रभु से विनती है कि वह साधुओं की संगति में रहकर तृप्त हो जाए॥ २॥

15हे मेरी रसना ! परमात्मा का भजन कर, परमात्मा का भजन करने से तृष्णा मिट जाती है।

16हे मेरी आत्मा ! मेरा परब्रह्म जिस जीव पर भी दया करता है, वह उसके मन में अपने नाम को बसा देता है।

17जो व्यक्ति पूर्ण सतिगुरु से मिलता है, उसे हरि धन रूपी निधि प्राप्त हो जाती है।

18नानक का कथन है कि हे मेरी आत्मा ! सौभाग्य से ही सद्पुरुषों की संगति मिलती है, जहाँ भगवान का यशोगान होता रहता है।॥ ३॥

19हे मेरी आत्मा ! परब्रह्म-प्रभु सब जीवों का दाता विश्व के कोने-कोने में बस रहा है,

20उसका अन्त नहीं पाया जा सकता है क्योंकि वह पूर्ण अकालपुरुष विधाता है।

21हे मेरी आत्मा ! वह सब जीवों का ऐसे भरण-पोषण करता है जैसे माता-पिता अपने बालक की परवरिश करते हैं।

22हे मेरी आत्मा ! हजारों चतुराईयों का प्रयोग करने पर भी परमात्मा नहीं मिलता किन्तु नानक ने गुरुमुख बनकर ईश्वर को समझ लिया है॥ ४॥ ६॥ छका १॥

23First Set of Six||

24बिहागड़ा महला ५ छंत घरु १

25ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

26हे मेरे प्यारे ! ईश्वर का मैंने एक अदभुत कौतुक देखा है कि वह जो कुछ भी करता है, वह धर्म अनुसार ही न्याय करता है।

27ईश्वर ने इस सृष्टि को एक ऐसा रंगभवन अथवा अखाड़ा बनाया हुआ है, जहाँ सभी जीवों का जन्म-मरण अटल किया हुआ है अर्थात् इस सृष्टि में प्राणी जन्म के रूप में आते तथा मृत्यु के रूप में चले जाते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं