गुरु ग्रंथ साहिब 538 · Raag Bihaagraa · Guru Raam Daas Ji
1हे मेरी आत्मा ! गुरु उपदेशानुसार अपने मन को टिकाना चाहिए, फिर यह दोबारा किसी अन्य स्थान पर नहीं भटकता।
2हे नानक ! जो व्यक्ति हरि-प्रभु के गुणों की वाणी उच्चरित करता है, उसे मनोवांछित फल मिल जाता है।॥ १॥
3हे मेरी आत्मा ! गुरु उपदेशानुसार अमृत नाम प्राणी के हृदय में निवास कर जाता है और तब वह अपने मुखारबिंद से अमृत वचन बोलता रहता है।
4हे मेरी आत्मा ! प्रभु के भक्तजनों की वाणी अमृत समान मधुर है, उसे चित्त लगाकर सुनने से प्राणी की हरि से सुरति लग जाती है।
5चिरकाल से बिछुड़ा हुआ हरि-प्रभु मुझे प्राप्त हो गया है और उसने सहज-स्वभाव ही मुझे अपने गले लगाया है।
6हे मेरी आत्मा ! दास नानक के हृदय में आनंद उत्पन्न हो गया है और उसके भीतर अनहद शब्द गूंज रहा है॥ २॥
7हे मेरी आत्मा ! मेरी कोई सखी-सहेली आकर मुझे मेरे हरि-प्रभु से मिला दे।
8मैं अपना मन उसे अर्पित करता हूँ, जो मुझे प्रभु की हरि-कथा सुनाता है।
9हे मेरी आत्मा ! गुरुमुख बनकर तू सदैव ही हरि की आराधना कर, तुझे मनोवांछित फल प्राप्त हो जाएगा।
10नानक का कथन है कि हे मेरी आत्मा ! हरि की शरणागत आकर उसका भजन कर, क्योंकि भाग्यशाली ही राम के नाम का ध्यान करते हैं।॥ ३॥
11हे मेरे प्रभु ! अपनी कृपा करके मुझे आन मिलो, ताकि गुरु की मतानुसार मेरे मन में नाम का प्रकाश हो जाए।
12हे मेरी आत्मा ! हरि के बिना मैं ऐसे हतोत्साहित हूँ, जैसे जल के बिना कमल उदासीन होता है।
13हे मेरी आत्मा ! पूर्ण गुरु ने सज्जन हरि से मिला दिया है, वह हरि-प्रभु आस-पास मेरे साथ ही रहता है।
14हे मेरी आत्मा ! वह गुरुदेव धन्य-धन्य है जिसने मुझे हरि के बारे में बताया है, जिसके नाम से दास नानक फूल की तरह खिल गया है॥ ४॥ १ ॥
15रागु बिहागड़ा महला ४ ॥
16हे मेरी आत्मा ! परमेश्वर का नाम अमृत समान है, पर यह अमृत गुरु के उपदेश से ही प्राप्त होता है।
17यह अहंकार माया रूपी विष है, हे मेरी आत्मा ! हरि के नामामृत द्वारा यह विष उतर जाता है।
18हे मेरी आत्मा ! हरि के नाम का ध्यान करने से मेरा सूखा हुआ मन हरा-भरा हो गया है।
19नानक का कथन है कि हे मेरी आत्मा ! मेरी किस्मत में आदि से लिखे हुए अच्छे भाग्य से मैंने भगवान को पा लिया है और मैं राम-नाम में समा गया हूँ॥ १॥
20हे मेरी आत्मा ! मेरा चित्त हरि के साथ ऐसे जुड़ा हुआ है, जैसे नवजात बालक का चित्त दूध से लगा होता है।
21हे मेरी आत्मा ! जैसे चातक वर्षा की बूंदों के बिना पुकारता रहता है वैसे ही हरि के बिना मुझे शांति प्राप्त नहीं होती।
22हे मेरी आत्मा ! सच्चे गुरु की शरण में पड़ो, वहाँ तुझे भगवान के गुणों के बारे में ज्ञान प्राप्त होगा।
23हे मेरी आत्मा ! दास नानक को हरि ने अपने साथ मिला लिया है और उसके घर में अनेक शब्द गूंज रहे हैं।॥ २॥
24हे मेरी आत्मा ! अहंत्व ने स्वेच्छाचारी लोगों को प्रभु से जुदा कर दिया है और वे विषैले पापों से बंधे अहंकार की अग्नि में जल रहे हैं।
25हे मेरी आत्मा ! जैसे पक्षी कबूतर आप ही दाने के लोभ के कारण जाल में फंस जाता है, वैसे ही सभी स्वेच्छाचारी मृत्यु के वश में आ जाते हैं।
26हे मेरी आत्मा ! जो मोह-माया में चित लगाते हैं, वे स्वेच्छाचारी मूर्ख तथा पिशाच हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं