गुरु ग्रंथ साहिब 536 · Raag Dayv Gandhaaree · Guru Arjan Dev Ji
1नानक को दासानुदास बना दो, चूंकि उसका सिर साधुओं के चरणों में विद्यमान रहे॥ २॥ ४॥ ३७ ॥
2रागु देवगंधारी महला ५ घरु ७
3ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
4हे सभी दिनों के समर्थ एवं पथ-प्रदर्शक प्रभु ! मैं तुझ पर करोड़ों बार बलिहारी जाता हूँ।
5तेरे संतजन प्रेमपूर्वक तेरी गुणस्तुति करते हैं, जो तुझे बहुत अच्छे लगते हैं और मैं उनके ही चरण स्पर्श करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
6हे दयास्वरूप ! तुझे अपना यश सुनने की कोई लालसा नहीं और तू सहज ही कौतुक करने वाला है। हे करुणामय एवं अद्वितीय परमात्मा ! तेरा स्थान अनंत एवं अनूप है॥१॥
7हे जगजीवन ! ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ एवं निधियाँ सब तेरी हथेली पर मौजूद हैं, हे सबके मालिक ! तेरे अनेकों ही नाम हैं।
8हे दयानिधि ! नानक पर अपनी कृपा करो ताकि तुम्हारा यश सुन-सुनकर जीवित रहे॥ २॥ १॥
9ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
10रागु देवगंधारी महला ९ ॥
11यह मन मेरी बात का अंश मात्र भी पालन नहीं करता।
12अपनी तरफ से मैं इसे बहुत शिक्षा प्रदान कर चुका हूँ किन्तु यह दुर्मति से हटता ही नहीं ॥ १॥ रहाउ॥
13यह माया के नशे में बावला हो गया है तथा हरि का यशगान उच्चरित नहीं करता।
14यह अनेक छल-कपट (प्रपंच) करके दुनिया को ठगता रहता है तथा अपना पेट भरता है॥ १॥
15यह मन कुते की पूंछ की भाँति कदापि सीधा नहीं होता और जो उपदेश देता हूँ, उस ओर कान नहीं करता।
16नानक का कथन है कि हे अज्ञानी मन ! राम नाम का नित्य ही भजन करो, जिससे तेरे सभी कार्य सम्पूर्ण हो जाएँगे॥ २॥ १॥
17देवगंधारी महला ९ ॥
18सब जीवित रहने तक ही अपना संबंध-व्यवहार बनाए रखते हैं,
19फिर वह चाहे माता-पिता, भाई, पुत्र, रिश्तेदार तथा घर की नारी (पत्नी) के सम्बन्ध हो। ॥१॥ रहाउ॥
20जब शरीर से प्राण निकल जाते हैं तो सभी संबंधी रोते-चिल्लाते हुए मृतक देह को प्रेत कहकर पुकारते हैं।
21आधी घड़ी मात्र भी कोई (मृतक देह को) नहीं रखना चाहता और घर से बाहर निकाल देते हैं ॥१॥
22अपने हृदय में सोच-विचार कर देख लो, यह जगत-रचना मृगतृष्णा की भाँति है।
23नानक का कथन है कि हे नश्वर प्राणी ! नित्य ही राम-नाम का भजन करो, ताकि तेरा संसार-सागर से उद्धार हो जाए॥ २॥ २ ॥
24देवगंधारी महला ९ ॥
25इस जगत में मैंने झूठा ही प्रेम देखा है।
26सभी लोग अपने सुख में ही लगे हुए हैं चाहे वह पत्नी हो अथवा घनिष्ठ मित्र ही क्यों न हो॥ १॥ रहाउ॥
27सभी लोग ‘मेरा-मेरा' ही पुकारते रहते हैं तथा अपने हित के लिए अपना मन जोड़ते हैं।
28जीवन के अंतिम क्षणों में कोई भी साथी नहीं बनता, यह संसार की आश्चर्यजनक रीति है॥ १॥
29हे मूर्ख मन ! तू अभी भी नहीं समझ रहा, मैं नित्य ही इसे शिक्षा देकर पराजित हो गया हूँ।
30हे नानक ! जो जीव प्रभु की महिमा के गीत गाता है, वह भवसागर से पार हो जाता है॥ २॥ ३॥ ६ ॥ ३८॥ ४७ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं