गुरु ग्रंथ साहिब 533 · Raag Dayv Gandhaaree
1ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
2देवगंधारी महला ५ ॥
3जब मैंने अपने सच्चे गुरु के पास विनती की तो
4दुःखनाशक परमात्मा दयालु एवं कृपालु हो गया और मेरे सभी डर मिट गए॥ रहाउ॥
5हे प्राणी ! हम कितने पापी, पाखंडी एवं लोभी हैं किन्तु फिर भी दयावान प्रभु हमारे गुण-अवगुण सभी सहन करता है।
6प्रभु ने (हमें रचकर) अपना हाथ हमारे मस्तक पर रखकर गौरव प्रदान किया है, जो दुष्ट हमें मारना चाहते थे, स्वयं ही मर गए हैं॥ १॥
7परमात्मा बड़ा परोपकारी एवं सभी को आधार देने वाला है, उसके दर्शन ही फलदायक हैं जो शांति का पुंज है।
8हे नानक ! परमात्मा निर्गुणों का भी दाता है, उसके चरण-कमल मैंने हृदय में बसाए हुए है॥ २॥ २४॥
9देवगंधारी महला ५ ॥
10हे मेरे प्रभु ! तू अनार्थो का नाथ है।
11हे दुनिया के रखवाले ! मैं तेरी शरण में आया हूँ॥ रहाउ॥
12हे मुरारि प्रभु! हर तरफ से मेरी रक्षा करो,
13लोकपरलोक एवं जिन्दगी के अन्तिम क्षण तक मेरी रक्षा करते रहना ॥ १॥
14हे मालिक ! जब भी तुझे याद करता हूँ तो तेरे गुण ही याद करता हूँ।
15उन गुणों को धारण करने से मेरा मन शुद्ध हो जाता है॥ २॥
16मैं गुरु के वचनों को सुनकर तेरे ही गुण गाता रहता हूँ तथा
17साधु (रूपी गुरु) के दर्शनों पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ॥ ३॥
18मेरे मन में एक ईश्वर का ही सहारा है।
19हे नानक ! मेरा प्रभु ही सबका रचयिता है॥ ४॥ २५॥
20देवगंधारी महला ५ ॥
21हे प्रभु ! मेरा केवल यही मनोरथ है कि
22हे कृपानिधि ! हे दीनदयाल ! मुझे अपने संतजनों का सेवक बना दीजिए॥ रहाउ॥
23मैं प्रातः काल संतजनों के चरण स्पर्श करता रहूँ और रात-दिन उनके दर्शन प्राप्त करता रहूँ।
24अपना तन-मन अर्पित करके मैं संतजनों की श्रद्धा से सेवा करता रहूँ और अपनी जिह्म से तेरा गुणानुवाद करता रहूँ॥ १॥
25मैं श्वास-श्वास से अपने प्रभु का सिमरन करता रहूँ और नित्य ही संतों की संगत में मिला रहूँ।
26हे नानक ! ईश्वर का नाम-धन ही मेरा जीवन का एकमात्र आघार है और इससे ही मैं आत्मिक आनंद प्राप्त करता रहूँ॥ २॥ २६॥
27रागु देवगंधारी महला ५ घरु ३
28ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
29मैंने मित्र रूपी ऐसा भगवान पा लिया है,
30जो मुझे छोड़कर नहीं जाता और हमेशा ही मेरे साथ रहता है, गुरु से मिलकर मैं रात-दिन उसका यशोगान करता रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
31मुझे सर्व सुख देने वाला मनोहर प्रभु मिल गया है और वह मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाता।
32मैंने विविधि प्रकार के लोग देखे हैं किन्तु वे मेरे प्रिय-प्रभु के एक रोम की समानता भी नहीं कर सकते॥१॥
33उसका मन्दिर बड़ा कीर्तिमान तथा द्वार बहुत शोभावान है, जिसमें मधुर अनहद ध्वनि गूंजती रहती है।
34हे नानक ! मैं सदा आनंद भोगता हूँ, क्योंकि प्रिय-प्रभु के घर में मुझे सदैव स्थिर स्थान मिल गया है॥ २ ॥ १॥ २७ ॥
35देवगंधारी ५ ॥
36मेरा मन प्रभु के दर्शन एवं नाम का अभिलाषी है और
37सभी स्थानों पर भटक कर अब संतों के चरणों में लग गया है॥ १॥ रहाउ ॥
38में किसकी सेवा करूँ और किसकी आराधना करूँ, क्योंकि जो कुछ भी नजर आ रहा है, वह नाशवान है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं