सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 526 · Raag Gujri · Bhagat Trilochan Ji

1हे जय चन्द ! सारा संसार भ्रम में पड़कर कुमार्गगामी हो गया है और

2इसने परमानंद प्रभु को अनुभव नहीं किया ॥ १॥ रहाउ॥

3घर-घर से भिक्षा लेकर खा-खाकर पेट को मोटा कर लिया है और माया की लालसा में गुदड़ी एवं कानों में कुण्डल धारण करके घूमते फिरते हो।

4तूने अपने शरीर पर श्मशानघाट की भस्म लगाई हुई है किन्तु गुरु के बिना तुझे सत्य का पता नहीं लगा ॥ २॥

5किसे जप रहे हो, कैसी तपस्या-साधना में मगन हो और क्यों जल का मंथन कर रहे हो ?

6उस निर्लिप्त परमात्मा का सिमरन कर, जिसने चौरासी लाख योनियों को पैदा किया है।॥३॥

7हे भगवा वेषधारी योगी ! तू क्यों हाथ में कमण्डल लेकर अड़सठ तीर्थों पर भटक रहा है ?

8त्रिलोचन का कथन है कि हे नश्वर जीव ! ध्यानपूर्वक सुन, यदि अन्न के दाने नहीं हैं तो इसे गहाने का कोई अभिप्राय नहीं ॥ ४॥ १॥

9गूजरी ॥

10जो व्यक्ति अन्तकाल लक्ष्मी (धन-दौलत) को याद करता है और इसी चिन्ता में डूबकर (लोभ विकार के बस मे ) प्राण त्याग देता है तो

11मरकर बार-बार सर्पयोनि में आता रहता है॥ १॥

12अरी बहन ! मुझे गोबिन्द का नाम कदापि न भूले॥ रहाउ॥

13जो व्यक्ति मृत्यु के समय स्त्री को याद करता रहता है और इसी चिन्ता में (काम विकार के बस मे ) उसके प्राण पखेरु हो जाते हैं तो

14वह बार-बार वेश्या की योनि में जन्म लेता रहता है॥ २॥

15जिन्दगी के अन्तिम क्षणों में जो व्यक्ति अपने पुत्रों को ही याद करता रहता है और इसी स्मृति में (मोह विकार के बस मे ) मर जाता है तो

16वह बार-बार सूअर की योनि में जन्म लेता रहता है।॥ ३॥

17जीवन के अन्तिम क्षणों में जो व्यक्ति घर-महल में ही ध्यान लगाए रखता है और इसी चिंता में (अहंकार विकार के बस मे ) प्राण त्याग देता है तो

18वह बार-बार प्रेत योनि में अवतरित होता है।॥ ४॥

19अन्तकाल (मृत्यु के क्षणों में) जो मनुष्य नारायण का सिमरन करता है और इसी स्मृति में (भक्ति के बस मे ) प्राण त्याग देता है तो

20त्रिलोचन का कथन है कि वह मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है तथा उसके हृदय में आकर ईश्वर निवास कर लेता है॥ ५॥ २॥

21गूजरी श्री जैदेव जीउ का पदा घरु ४

22ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

23आदिपुरुष परमात्मा परम पवित्र है, वह उपमा से रहित है, वह सदैव सत्य एवं सर्वगुणसम्पन्न है।

24वह परम अदभुत परमात्मा प्रकृति से परे है, जिसका चिन्तन करने से सभी परमगति प्राप्त कर लेते हैं, वह सर्वव्यापक है॥ १॥

25केवल राम के सुन्दर नाम का सुमिरन करो जो

26अमृत से भरपूर एवं परम तत्व यथार्थ का स्वरूप है।

27जिसका सिमरन करने से जन्म-मरण, बुढ़ापा, चिन्ता एवं मृत्यु का डर दुःखी नहीं करता ॥ १॥ रहाउ॥

28यदि यमदूत इत्यादि को पराजित करना चाहते हो, तो स्वरित स्वरूप प्रभु का यशोगान करने के शुभ कर्म करता जा।

29प्रभु वर्तमान काल, भूतकाल एवं भविष्य काल में सदैव ही पूर्ण रूप से व्यापक एवं परम प्रसन्न स्वरूप है॥ २॥

30यदि शुभ आचरण का मार्ग पाना चाहते हो तो लोभ एवं पराए घर पर दृष्टि रखना त्याग दो।

31सभी दुष्कर्म एवं दुर्मति को त्याग दो और चक्रधर प्रभु की शरण में आ जाओ।॥ ३॥

32हरि के प्रिय भक्त मन, वचन एवं कर्म से पावन होते हैं इसलिए मन, वचन एवं कर्म द्वारा हरि की भक्ति करो।

33योग-तपस्या, दान-पुण्य एवं यज्ञ इत्यादि का इस दुनिया में क्या अभिप्राय है॥ ४॥

34हे मानव ! गोविन्द का ही नाम-सुमिरन एवं जाप करो क्योंकि वही सर्व सिद्धियों का श्रेष्ठ स्थान है।

35जयदेव भी उस प्रभु की शरण में आया है जो वर्तमान काल, भूतकाल एवं भविष्यकाल में सब की मुक्ति करने वाला है॥ ५॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं