गुरु ग्रंथ साहिब 525 · Raag Gujri
1गूजरी श्री नामदेव जी के पदे घरु १
2ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
3हे परमेश्वर ! यदि तू मुझे साम्राज्य भी दे दो तो इसमें मेरी कौन-सी बड़ाई है ?
4यदि तू मुझे भिखारी बनाकर भिक्षा मंगवा ले तो भी इसमें मेरा क्या कम हो जाएगा ? ॥ १॥
5हे मेरे मन ! तू हरि का भजन कर, तुझे मोक्ष की पदवी प्राप्त हो जाएगी।
6इस तरह तेरा इस दुनिया में दोबारा जन्म-मरण नहीं होगा।॥ १॥ रहाउ॥
7हे प्रभु ! सारी सृष्टि तूने स्वयं ही उत्पन्न की हुई है तथा स्वयं ही इसे भ्रम में भटकाया हुआ है।
8जिसे तू सुमति प्रदान करता है, वही तुझे समझता है॥ २ ॥
9जब सतगुरु मिल जाता है तो मन की दुविधा नष्ट हो जाती है।
10हे भगवान ! तेरे सिवाय मैं किसकी पूजा करूं ? क्योंकि मुझे अन्य कोई गुणदाता दिखाई ही नहीं देता॥ ३॥
11बड़ी हैरानी है कि एक पत्थर (मूर्ति बनाकर) श्रद्धा से पूजा जाता है और
12दूसरा पत्थर पैर से लताड़ा जाता है।
13यदि एक पत्थर देवता है तो दूसरा भी देवता ही है।
14नामदेव का कथन है कि हम तो (मूर्ति पूजा को छोड़कर केवल) परमात्मा की ही सेवा करते हैं।॥ ४॥ १॥
15गूजरी घरु १ ॥
16हे बहन ! उस ईश्वर में मोह-माया की मैल का लेशमात्र भी चिन्ह नहीं, वह तो मैल से परे है अर्थात् पवित्र-पावन है तथा चन्दन की सुगन्धि के समान सबके हृदय में आकर बसा हुआ है।
17उस ईश्वर को कभी किसी ने आते हुए नहीं देखा, इसलिए उसे कौन जान सकता है कि उसका स्वरूप कैसा है?॥ १॥
18हे बहन ! सर्वव्यापक प्रभु के गुणों के बारे में कौन वर्णन कर सकता है और उसके स्वरूप को कौन समझ सकता है? वह तो कुल रहित है॥ १॥ रहाउ॥
19जैसे आकाश में पक्षी उड़ता है किन्तु उसका रास्ता नजर नहीं आ सकता,
20जैसे जल में मछली तैरती है किन्तु उसका भी रास्ता दिखाई नहीं दे सकता॥ २॥
21जैसे आकाश में मृगतृष्णा की भाँति जल से भरा घड़ा दिखाई दे किन्तु उसका निश्चित स्थान नहीं मिलता अर्थात् वैसे ही परमात्मा का निश्चित ठिकाना प्राप्त नहीं हो सकता।
22नामदेव का स्वामी विठ्ठल भगवान तो ऐसे है, जिसने तीनों संताप नाश कर दिए हैं॥ ३ ॥ २ ॥
23गूजरी श्री रविदास जी के पदे घरु ३
24ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
25दूध तो गाय के थनों में ही बछड़े ने जूठा कर दिया है,
26फूलों को भेंवरे ने सूंघा हुआ है तथा जल मछली ने अशुद्ध कर दिया है॥ १॥
27हे मेरी माता ! गोविन्द की पूजा-अर्चना करने के लिए मैं कौन-सी भेंट-सामग्री अर्पित करूँ ?
28मुझे कोई अन्य अनूप सुन्दर फूल नहीं मिल सकता, क्या इसके अभाव से प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकूंगा ?॥ १॥ रहाउ॥
29जहरीले साँपों ने चन्दन के पेड़ को लिपेटा हुआ है।
30विष एवं अमृत सागर में साथ-साथ ही बसते हैं।॥ २॥
31हे प्रभु! धूप, दीप, नैवेद्य एवं सुगन्धियों से
32तेरा सेवक कैसे पूजा कर सकता है ? क्योंकि वे भी अशुद्ध ही हैं।॥ ३॥
33अपना तन-मन भगवान को अर्पण करके पूजा की जाए तो
34गुरु की कृपा से निरंजन प्रभु को पाया जा सकता है॥ ४॥
35रविदास का कथन है कि हे ईश्वर ! यदि मुझसे तेरी पूजा-अर्चना नहीं हो सकी तो
36फिर आगे मेरी क्या गति होगी॥ ५॥ १॥
37गूजरी श्री त्रिलोचन जीउ के पदे घरु १
38ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
39यदि अन्तर मैला है और उसे निर्मल नहीं किया तथा बाहर से चाहे उदासीन का वेष धारण किया हुआ है तो इसका क्या अभिप्राय है ?
40हे भाई ! अपने हृदय कमल में ब्रह्म को न पहचान कर क्यों संन्यासी बने हुए हो ?॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं