सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 524 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji

1वह निन्दकों को सिर के केशों से पकड़ कर पछाड़कर उन्हें यम के मार्ग में धकेल देता है।

2वह उन्हें घोर नरक में भेज देता है, जहाँ वे दुःखी होकर रोते-चिल्लाते हैं।

3हे नानक ! (लेकिन) अपने दासों को गले से लगाकर सच्चा हरि उनकी रक्षा करता है॥ २० ॥

4श्लोक महला ५॥

5हे भाग्यशाली प्राणियो ! राम का नाम जपो, क्योंकि वह जल एवं धरती में पूर्ण तौर पर मौजूद है।

6हे नानक ! प्रभु-नाम का ध्यान करने से जीव को कोई विघ्न नहीं आता ॥१॥

7महला ५॥

8जिस जीव को भगवान का नाम भूल जाता है, उसे करोड़ों ही विघ्न घेर लेते हैं।

9हे नानक ! वे रात-दिन ऐसे रोते रहते हैं जैसे सूने घर में कौआ कांव-कांव करता है॥ २॥

10पउड़ी॥

11दातार प्रभु का सिमरन करने से सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

12मेरे मन की इच्छा एवं आशा पूर्ण हो गई है तथा सर्व प्रकार के दुःख-संताप नष्ट हो गए हैं।

13जिसे खोजता रहता था, उस प्रभु नाम रूपी भण्डार को प्राप्त कर लिया है।

14मेरी ज्योति परम-ज्योत में लीन हो गई है और मेरी साधना खत्म हो गई है।

15मैं अब उस घर में रहता हूँ, जहाँ सहज सुख एवं आनंद प्रवृत्त हो रहे हैं।

16मेरा आवागमन भी मिट गया है क्योंकि वहाँ जन्म-मरण नहीं होता।

17स्वामी एवं सेवक एकरूप ही हो गए हैं और दोनों एक समान ही दृष्टिगत होते हैं।

18हे नानक ! गुरु की कृपा से मैं सत्य में समा गया हूँ॥ २१॥ १॥ २॥ शुद्ध ॥

19रागु गूजरी भगता की बाणी

20ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

21श्री कबीर जीउ का चउपदा घरु २ दूजा ॥

22हे जीव ! पशु योनि में आकर जब तू चार पैर, दो सीग एवं मुँह से गूंगा बन जाएगा तो फिर कैसे ईश्वर का गुणगान करेगा ?

23उठते-बैठते तुझे डण्डे से मार पड़ेगी, तब तू अपना सिर कहाँ छिपा सकेगा ? ॥ १॥

24हरि-नाम के बिना तू उधारी बैल बन जाएगा,

25जिसका नाक फटा हुआ तथा कन्धा टूटा हुआ होता है और जो भूसा ही खाता रहता है॥ १॥ रहाउ ॥

26हे जीव ! सारा दिन वन में भटकने के पश्चात् भी तेरा पेट नहीं भरेगा।

27तूने भक्तजनों का कहना तो माना नहीं, परिणामस्वरूप अपने कर्मों का फल अवश्य पाओगे॥ २॥

28अब जीव दुःख-सुख भोगता तथा महा दुविधा में डूबा हुआ अनेक योनियों के चक्र में भटकेगा।

29हे जीव ! प्रभु को भुला कर तूने हीरे जैसा अनमोल मनुष्य-जन्म व्यर्थ ही गंवा दिया है, ऐसा अवसर तुझे अब कहाँ प्राप्त होगा ? ॥ ३॥

30हे जीव ! तेली के बैल एवं बन्दर की तरह भटकते हुए तेरी जीवन रूपी रात्रि मुक्ति प्राप्त किए बिना ही व्यतीत हो जाएगी।

31कबीर जी का कथन है कि हे जीव ! राम नाम के बिना तू अपना सिर पटक पटक कर पछताएगा।॥ ४॥ १॥

32गूजरी घरु ३ ॥

33कबीर की माता सुबक-सुबक रोती है और

34निवेदन करती है कि हे रघुराई ! ये (कबीर के) बच्चे किस तरह जीवित रह सकेंगे।॥१॥

35क्योंकि कबीर ने कातना एवं बुनना सभी छोड़ दिया है तथा

36हरि का नाम अपने शरीर पर लिख लिया है॥ १॥ रहाउ ॥

37कबीर अपनी माता से कहता है कि जितनी देर मैं नली के छेद में धागा पिरोता हूँ,

38उतनी देर तक तो मुझे अपना स्नेही राम भूल जाता है॥ २॥

39मैं जाति का जुलाहा हूँ तथा मेरी बुद्धि ओछी (छोटी) है।

40हरि के नाम का लाभ मैंने प्राप्त कर लिया है॥ ३॥

41कबीर जी कहते हैं कि हे मेरी माता ! जरा ध्यान से सुनो,

42मेरा और इन बच्चों का दाता तो एक परमात्मा ही है॥ ४॥ २ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं