गुरु ग्रंथ साहिब 522 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji
1हे दयानिधि ! ये भक्त तेरे ही हैं, उन पर अपनी मेहर कर।
2दुःख, दर्द, बड़ा रोग एवं माया उनको स्पर्श नहीं कर सकती।
3गोविन्द का गुणगान ही भक्तों के जीवन का आधार है।
4वे सदा-सर्वदा दिन-रात एक ईश्वर का ही ध्यान करते रहते हैं और
5अमृत-नाम का पान करके नाम में ही तृप्त रहते हैं।॥ १४॥
6श्लोक महला ५ ॥
7जिसे ईश्वर का नाम भूल जाता है, उसे (पथ में) करोड़ों ही विघ्न लग जाते हैं।
8हे नानक ! ऐसे लोग रात-दिन यूं रोते-चिल्लाते हैं जैसे सूने घर में कौआ कांव-कांव करता है॥ १॥
9महला ५॥
10वही ऋतु सुन्दर है, जब प्रियतम-प्रभु से मिलन होता है।
11हे नानक ! उसे नित्य ही याद करते रहना चाहिए और एक घड़ी एवं मुहूर्त भर के लिए भी भुलाना नहीं चाहिए॥ २॥
12पउड़ी॥
13काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार इतने शूरवीर एवं पराक्रमी हैं कि इन्होंने शक्तिशाली एवं हठीली सेना एकत्र कर ली है। ये पाँचों विकार किसी के रोकने पर भी नहीं रुकते।
14दस इन्द्रियाँ अवधूत पुरुषों को भी विषयों विकारों में लगाए रखती हैं।
15सभी पर विजय पाकर ये अपने साथ मिलाते जाते हैं और ये इसी बात की लालसा करते हैं।
16त्रिगुणात्मक दुनिया उनके वश में है और कोई भी उनसे संघर्ष नहीं कर सकता।
17भ्रम रूपी किला एवं माया की खांई को बताओ किस विधि से तोड़ा जा सकता है?
18पूर्ण गुरु की आराधना करने से यह भयानक दल फोड़ा जा सकता है इसलिए
19मैं रात-दिन उस गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा रहता हूँ॥ १५॥
20श्लोक महला ५॥
21नित्य ही परमात्मा का गुणगान करने से सभी पाप उतर जाते हैं।
22हे नानक ! यदि परमात्मा का नाम भूल जाए तो करोड़ों ही दुःख-क्लेश उत्पन्न हो जाते हैं।॥ १॥
23महला ५॥
24हे नानक ! सच्चे गुरु से भेंट होने पर जीवन से मुक्ति पाने की युक्ति मिल जाती है और
25फिर हँसते, खेलते, पहनते, खाते-पीते हुए भी मुक्ति हो जाती है।॥ २॥
26पउड़ी॥
27वह सतगुरु धन्य-धन्य है, जिसने भ्रम का दुर्ग ध्वस्त कर दिया है।
28वह सतगुरु स्तुति-योग्य है, जिसने मुझे भगवान से मिला दिया है।
29प्रभु-नाम का अक्षय भण्डार गुरु ने मुझे औषधि के रूप में दिया है और
30उसने इस औषधि से महाविकराल रोग दूर कर दिया है।
31मुझे प्रभु नाम-धन रूपी बहुत बड़ा खजाना हासिल हो गया है
32जिससे अपार जन्म का महत्व पहचान लिया है।
33सर्वकला समर्थ गुरुदेव की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती क्योंकि
34गुरू आप ही परब्रह्म-परमेश्वर अपरंपार, अलक्ष्य एवं अभेद सत्य का रूप है॥ १६॥
35श्लोक महला ५ ॥
36हे जीव ! तू नाम-सिमरन का उद्यम करते हुए अपना जीवन व्यतीत कर, इस साधना से तू सुख भोगेगा।
37हे नानक ! नाम की आराधना करने से प्रभु मिल जाएगा और तेरी चिंता दूर हो जाएगी॥ १॥
38महला ५॥
39हे गोविन्द ! मुझे शुभ चिंतन, सुमिरन एवं निर्मल साधु-संगति की देन प्रदान कीजिए।
40हे भगवान ! नानक पर ऐसी कृपा करो कि वह तेरे नाम को एक घड़ी भर के लिए भी न भूले॥ २॥
41पउड़ी॥
42हे स्वामी ! जब सब कुछ तेरा किया ही घटित होता है तो हम क्यों डर अनुभव करें?
43जिसके साथ मिलकर नाम-सुमिरन किया जाता है उसे अपने प्राण अर्पण कर देने चाहिए।
44उस बेशुमार मालिक को मन में याद करने से जीव आनंदित हो जाता है।
45जिसके साथ निरंकार परमात्मा है, उसे कोई दुख स्पर्श नहीं कर सकता।
46सब कुछ उसके वश में है और कोई भी उसके हुक्म से बाहर नहीं।
47वह परम-सत्य प्रभु भक्तों के मन में निवास करता है और उनकी अन्तरात्मा में समा जाता है।
48हे भगवान ! तेरे दास तेरा ही ध्यान करते हैं और तू ही उनका रखवाला है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं