सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 521 · Raag Gujri

1महला ५॥

2जमीन पानी में रहती है और लकड़ी अपने भीतर अग्नि को टिकाकर रखती है।

3हे नानक ! उस मालिक की कामना कर, जो सभी जीवों का आधार है। ॥२ ॥

4पउड़ी॥

5हे स्वामी ! तेरे किए हुए कार्य तुझ पर ही निर्भर हैं।

6इस दुनिया में वही कुछ हो रहा है जो तू अपने हुक्म से करवा रहा है।

7मैं तेरी आश्चर्यजनक कुदरत को देखकर चकित हो गया हूँ।

8तेरे दास तेरी शरण में आ गए हैं, यदि तुम कृपा-दृष्टि धारण करो तो मेरी भी गति हो जाएगी।

9तेरे हाथ में नाम का भण्डार है, जो तुझे अच्छा लगता है, उसे तुम यह भण्डार दे देते हो।

10जिस व्यक्ति पर तू दयालु होता है, वही हरि-नाम का भण्डार प्राप्त करता है।

11हे अगम्य, अगोचर एवं अनन्त प्रभु ! तेरा अन्त नहीं पाया जा सकता।

12जिस पर तू कृपालु होता है वही तेरे नाम का ध्यान करता है॥ ११ ॥

13श्लोक महला ५॥

14कड़छीआ भोजन के बर्तन पर चलती हैं परन्तु वह भोजन के स्वाद को नहीं जानती और स्वाद से खाली ही रहती हैं।

15हे नानक ! वही मुख सुन्दर दिखाई देते हैं, जो प्रभु के प्रेम रस में लीन रहते हैं।॥ १॥

16महला ५॥

17खोजी गुरु के द्वारा मैंने उनकी खोज कर ली है, जिन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी विकारों ने मेरी हृदय रूपी फसल बर्बाद कर दी थी।

18नानक का कथन है कि हे पति-प्रभु ! तूने गुरु रूपी बाड़ कर दी है और अब फसल नष्ट नहीं होगी॥ २॥

19पउड़ी॥

20हे भाई ! उस परमात्मा की आराधना करो, जिसके पास सबकुछ है।

21वह स्वयं ही दोनों किनारों का मालिक है और एक क्षण में ही कार्य संवार देता है।

22तू सभी उपाय त्याग दे और उसकी ओट ले।

23भागकर उसकी शरण में जा और सर्वोत्तम सुख प्राप्त कर।

24शुभ कर्म, धर्भ एवं तत्व ज्ञान संतजनों की संगति में प्राप्त होते हैं।

25अमृत नाम जपने से प्राणी को कोई विघ्न नहीं आता।

26जिस पर परमात्मा आप दयालु है, उसके मन में ही वह बसता है और

27उसकी प्रसन्नता से सभी खजाने प्राप्त हो जाते हैं॥ १२ ॥

28श्लोक महला ५॥

29जब मेरे प्रियतम ने मुझ पर कृपा की तो खोजने योग्य ईश्वर को मैंने खोज लिया।

30हे नानक ! एक ईश्वर ही जगत का रचयिता है, उसके सिवाय मुझे दूसरा कोई नजर नहीं आता ॥ १॥

31महला ५॥

32सत्य का बाण तान कर दुर्जन पापों को पछाड़ दे।

33हे नानक ! गुरु के मंत्र को याद करो, कोई दु:ख नहीं सताएगा ॥ २ ॥

34पउड़ी॥

35वह विश्व का निर्माता प्रभु धन्य-धन्य है, जिसने स्वयं हृदय शीतल कर दिया है।

36उस ईश्वर का सदैव जाप करना चाहिए जो जीव-जन्तुओं पर मेहरबान है,

37उस समर्थ प्रभु ने मुझ पर दया की है और मेरे सभी दुःख-क्लेश मिट गए हैं।

38पूर्ण गुरु के प्रताप से मेरे संताप, दुःख एवं रोग सभी भाग गए हैं।

39गरीबनिवाज परमात्मा ने स्वयं मेरी रक्षा करके मुझे स्थापित किया है और

40सभी बंधन काट कर उसने आप ही मुझे मुक्त कर दिया है।

41मेरी तृष्णा मिट गई है, आशा पूर्ण हो गई है और मेरा मन संतोषी एवं प्रसन्न हो गया है।

42वह मालिक प्रभु सबसे बड़ा और अपार है जो पुण्य एवं पाप से अलिप्त है॥ १३॥

43श्लोक महला ५॥

44जिन पर प्रभु कृपालु हो जाता है, वे हरि-नाम ही जपते रहते हैं।

45हे नानक ! सत्संगति में मिलने से जीव की प्रीति राम से लग जाती है॥ १॥

46महला ५॥

47हे भाग्यशाली जीवो ! उस राम का नाम-सिमरन करो, जो जल, धरती एवं गगन में हर जगह मौजूद है।

48हे नानक ! नाम की आराधना करने से जीव को कोई संकट नहीं आता॥ २॥

49पउड़ी॥

50भक्तों का बोला हुआ हर वचन (भगवान को) मंजूर होता है और आगे सत्य के दरबार में काम आता है।

51हे प्रभु ! भक्तों को तेरा ही सहारा है और वे तो सत्यनाम में ही लीन रहते हैं।

52जिस पर तू कृपालु हो जाता है, उसका दुःख-संताप नष्ट हो जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं