गुरु ग्रंथ साहिब 51 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! वह सुहागिनें (प्राणी) धन्य हैं, जिन्होंने अपने पति-परमेश्वर का प्रेम प्राप्त कर लिया है II ४ II २३ II ६३ II
2श्रीरागु महला ५ घरु ६ ॥
3जिस एक परमात्मा ने सृष्टि-रचना की है, वह परमात्मा ही करने एवं कराने वाला है।
4हे मेरे मन ! उसका सिमरन करो, जो समस्त जीवों का आधार है॥१॥
5हे मन ! अपने हृदय में गुरु के चरणों का ध्यान करो
6और अपनी समस्त चतुराइयों त्यागकर सत्य नाम में सुरति लगाओ ॥१॥ रहाउ॥
7यदि मनुष्य के हृदय में गुरु का मंत्र (शब्द) बस जाए तो उसके समस्त दुःख-संताप अथवा मृत्यु का भय कदापि आगमन नहीं करते।
8मनुष्य करोड़ों ही उपाय करके असफल हो गए हैं। परन्तु गुरु के बिना किसी का भी इस भवसागर से उद्धार नहीं हुआ ॥२॥
9गुरदेव के दर्शन-मात्र से ही आत्मा को सहारा प्राप्त होता है और समस्त दोष निवृत्त हो जाते हैं।
10मैं उन पर न्योछावर होता हूँ, जिन्होंने गुरु-चरणों पर स्वयं को अर्पण किया है ॥३॥
11साधू की संगति करने से ही ईश्वर का सत्य नाम मन में आकर बसता है।
12हे नानक ! वे मनुष्य बड़े सौभाग्यशाली हैं, जिनके हृदय में भगवान के लिए प्रेम है ॥४॥२४॥९४॥
13श्रीरागु महला ५ ॥
14हे प्राणी! समस्त पाप विकारों को त्याग दो। सतिगुरु की पूजा करो एवं हरि नाम रूपी धन संचित करो।
15जिस परमात्मा ने तुझे पैदा करके संवारा है, उसका सिमरन करने से तेरा उद्धार हो। जाएगा ॥१॥
16हे मेरे मन ! एक अपार प्रभु का ही नाम जपो।
17जिस ईश्वर ने तुझे प्राण, मन एवं तन दिया है, वही समस्त जीवों के हृदय का आधार है॥१॥ रहाउ॥
18सम्पूर्ण जगत् काम, क्रोध अहंकार इत्यादि में मग्न है, दुनिया माया के मोह में फँसी हुई है।
19हे प्राणी ! तू संतों के चरणों में लगकर उनकी शरण में जा, फिर तेरा दुख मिट जाएगा और तेरे मन में से अज्ञानता का अँधेरा दूर हो जाएगा ॥२॥
20हे प्राणी ! जीवन की श्रेष्ठ करनी यही है कि तू सत्य, संतोष एवं दया की पूंजी संचित कर।
21जिस प्राणी पर निरंकार प्रभु ने कृपा-दृष्टि की है, वह अपना अहंकार त्याग कर उसी की चरण धूल बन जाता है॥३॥
22समूचा दृश्यमान संसार उसी प्रभु का प्रसार है, वही उसमें व्यापक है।
23हे नानक ! कहो- गुरु ने जिस व्यक्ति की शंका निवृत्त कर दी है, वह सारे जगत् को ब्रह्म ही समझता है ॥ ४ ॥ २५ ॥ ९५ ॥
24श्रीरागु महला ५ ॥
25समूचा जगत् शुभ एवं अशुभ कर्मों के जाल में फँसा हुआ है।
26कोई विरला प्रभु-भक्त ही मिलता है, जो इन दोनों प्रकार के कर्मों से रहित हो। ॥१॥
27परमात्मा समस्त जीवों में समाया हुआ है।
28हे मेरे मालिक ! मैं तेरे बारे में क्या कहूँ और क्या सुनुं? तू सबसे महान चतुर पुरुष है ॥१॥ रहाउ॥
29जो व्यक्ति मान-अभिमान में फँसा हुआ है, वह ईश्वर का भक्त नहीं।
30हे संतो ! करोड़ों मनुष्यों में से कोई विरला ही है जिसे परमतत्व प्रभु का ज्ञान है और जो समस्त जीवों को एक दृष्टि से देखता है॥ २॥
31भगवान बारे वाद-विवाद करना दुनिया में व्यर्थ शोभा प्राप्ति का एकमात्र साधन है।
32लेकिन कोई विरला ही गुरमुख है जो इस वाद-विवाद से परे रहता है।
33वाद-विवाद करने वालों को गति एवं अवगति की अवस्था कुछ भी दिखाई नहीं देती ॥३॥
34हे नानक ! मैंने संतों की चरण-धूलि का दान प्राप्त कर लिया है II ४ II २६ Il ६६ II
35श्रीरागु महला ५ घरु ७ ॥
36हे प्रिय प्रभु ! तेरे भरोसे पर मैंने बालक भाँति प्रीति में रहकर हास-विलास किए हैं।
37हे भगवान ! तुम ही मेरी माता एवं मेरे पिता हो, मैं तेरा बालक हूँ जो भूल चूक करता हूँ ॥१॥
38बातें करनी बड़ी सरल हैं।
39परन्तु आपके विधान अनुसार चलना बड़ा कठिन है ॥१॥ रहाउ ॥
40हे प्रभु ! मुझे आपके ऊपर बड़ा मान है, क्योंकि मुझे आपके बल का ही आधार है और मैं आपको अपना रक्षक समझता हूँ।
41हे परम पिता ! आप समस्त जीवों के भीतर मौजूद हो, सबसे बाहर भी आप ही हो ॥ २॥
42हे मेरे पिता ! मैं तेरी युक्ति को नहीं जानता जिससे तू प्रसन्न होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं