गुरु ग्रंथ साहिब 518 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji
1जिसकी आराधना करने से सुख प्राप्त होता है और सभी दुःख दूर हो जाते हैं॥ २॥
2पउड़ी ॥
3परमात्मा कुल रहित, मायातीत, सर्वशक्तिमान, अगम्य एवं अपार है।
4वास्तव में सत्य का पुंज, परम-सत्य परमात्मा सत्य का रूप बनकर ही दिखाई देता है।
5हे प्रभु ! यह सृष्टि तेरी पैदा की हुई है मगर कोई भी वस्तु काल्पनिक नहीं लगती।
6वह दाता सभी को भोजन देता है, जिन्हें उसने पैदा किया है और
7सभी को एक ही हुक्म रूपी धागे में पिरोकर उसने उनके भीतर अपनी ज्योति प्रकाशमान की है।
8उसके हुक्म से कई भवसागर में डूब जाते हैं और कई पार हो जाते हैं।
9हे पूज्य प्रभु ! जिसके मस्तक पर भाग्य होता है, वही मनुष्य तुझे याद करता है।
10तेरी गति एवं अनुमान (शक्ति) जाने नहीं जा सकते, इसलिए मैं तुझ पर बलिहारी जाता हूँ॥ १॥
11श्लोक महला ५॥
12हे मेहरबान परमात्मा ! यदि तू खुश हो जाए तो अचिंत ही हमारे मन में निवास कर लेता है।
13हे मेहरबान ! यदि तू खुश हो जाए तो हमारे हृदय रूपी घर में ही नवनिधियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
14हे दयालु प्रभु ! यदि तू प्रसन्न हो जाए तो मैं गुरु के मंत्र की साधना करता हूँ।
15नानक प्रार्थना करता है कि हे मेहरबान ! जब तू प्रसन्न हो जाता है तो मैं सत्य में ही समा जाता हूँ॥ १॥
16महला ५॥
17कितने ही राजसिंहासन पर बैठते हैं और उनके लिए अनेक वाद्ययन्त्र बजते हैं।
18हे नानक ! सत्यनाम के बिना किसी की भी मान-प्रतिष्ठा नहीं बची ॥ २ ॥
19पउड़ी॥
20हे स्वामी ! वेद तथा कतेब साथ खड़े तेरी स्तुति कर रहे हैं।
21जो तेरे द्वार पर नतमस्तक पड़े हुए हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती।
22ब्रह्मा भी तेरी वन्दना करता है तथा इन्द्रासण पर विराजमान इन्द्र भी तुझे याद करता है।
23शंकर, विष्णु अवतार अपने मुख से हरि यश करते हैं।
24हे प्रभु ! पीर-पैगम्बरं, शेख और औलिया तुझे ही स्मरण करते हैं।
25हे निराकार परमात्मा ! ताने-पेटे की भाँति हरेक जीव में तू ओत-प्रोत है।
26झूठ के कारण मानव का विनाश हो जाता है तथा धर्म के मार्ग पर वह प्रफुल्लित होता है।
27जहाँ-कहीं भी परमात्मा जीव को लगाता है, उधर ही वह लग जाता है॥ २ ॥
28श्लोक महला ५॥
29अज्ञानी मानव (शुभ कर्म) अच्छाई करने में आलस्य करता है लेकिन बुरा करने में शेर बन जाता है।
30हे नानक ! आज अथवा कल मृत्यु ने आना ही है और मूर्ख मनुष्य के पैर में मौत का फंदा पड़ना ही है॥ १॥
31महला ५॥
32हमारे अनेक दुष्कर्मो का हित तुम से छिपा हुआ नहीं।
33हे नानक के परमेश्वर ! तुम ही हमारे मन में सच्चे मित्र हो और तूने ही हमारी बुराइयों को ढंका हुआ है॥ २॥
34पउड़ी॥
35हे दयालु परमेश्वर ! मैं तुझसे यह दान माँगता हूँ कि मुझे अपने दासों का सेवक बना दो।
36हे दाता ! तेरा नाम-स्मरण करने से ही मैं जीवित हूँ और नवनिधियाँ एवं राज प्राप्त करता हूँ।
37प्रभु के दासों के घर में अमृत नाम का भारी भण्डार है,
38उनकी संगति में विराज कर मैं अपने कानों से तेरा यश सुनकर आनंदित हो जाता हूँ।
39उनकी सेवा करने से मेरा शरीर पवित्र हो गया है।
40मैं उनके लिए पंखा करता हूँ, उनके लिए जल लाता हूँ, उनके लिए चक्की पीसता हूँ और उनके चरण धोकर खुश होता हूँ।
41हे प्रभु! मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि कर दीजिए, चूंकि अपने आप मैं कुछ भी नहीं कर सकता।
42मुझ निर्गुण को संतों की धर्मशाला में शरण दीजिए॥३॥
43श्लोक महला ५॥
44हे मेरे साजन ! मैं सदा ही तेरे चरणों की धूलि बना रहूँ।
45नानक की प्रार्थना है कि हे प्रभु जी ! मैंने तेरी ही शरण ली है और मैं हमेशा ही तुझे अपने पास देखता रहूँ॥ १॥
46महला ५॥
47हरि के चरणों में अपने मन को लगाकर असंख्य पतित जीव पवित्र-पावन हो गए हैं।
48हे नानक ! प्रभु का नाम ही अड़सठ तीर्थ (के समान) है लेकिन यह उसे ही प्राप्त होता है जिसके मस्तक पर भाग्य लिखा होता है॥ २ ॥
49पउड़ी।
50अपनी प्रत्येक सांस एवं ग्रास से परवरदिगार का नाम जपना चाहिए।
51जिस पर वह रहम करता है, वह उसे नहीं भुलाता।
52वह स्वयं ही दुनिया की रचना करने वाला है और स्वयं ही बिनाशक है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं