गुरु ग्रंथ साहिब 517 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji
1अपने सतिगुरु की सेवा करके मैंने सभी फल प्राप्त कर लिए हैं।
2मैं सदा ही हरि के नामामृत का ध्यान करता हूँ।
3संतजनों की संगति में रहकर मैंने अपने दुःख मिटा लिए हैं।
4हे नानक ! हरि का निश्चल धन प्राप्त करके मैं निश्चिंत हो गया हूँ॥ २० ॥
5श्लोक महला ३॥
6जिस तरह किसान ऊँचे बादल देखकर खेत की मेंढ ऊँची कर देता है,
7वैसे ही जीव-स्त्री के हृदय-घर में साजन प्रभु प्रवेश कर जाता है और भक्ति के कारण अतिथि बना रहता है।
8हे मेध रूपी गुरुदेव ! यद्यपि हरि-नाम की वर्षा करनी है तो करो क्योंकि आयु बीतने पर फिर बरसने का क्या अभिप्राय ?
9हे नानक ! जिन्होंने गुरुमुख बनकर परमात्मा को मन में प्राप्त कर लिया है, मैं उनसे बलिहारी जाता हूँ॥ १॥
10महला ३॥
11मीठा वही होता है, जो अच्छा लगता है और सच्चा मित्र वही है जो दुख-सुख में साथ निभाने वाला हो।
12हे नानक ! जिसके मन में भगवान आप प्रकाश करता है, वही गुरुमुख जाना जाता है॥ २ ॥
13पउड़ी॥
14प्रभु के पास सेवक की प्रार्थना है, हे प्रभु ! तू ही मेरा सच्चा साँई है।
15तू सदैव ही मेरा रखवाला है, मैं तेरी ही आराधना करता हूँ।
16सारे जीव-जन्तु तेरे ही पैदा किए हुए हैं, तू सबमें समा रहा है।
17जो तेरे दास की निन्दा करता है, उसे तुम कुचल कर नष्ट कर देते हो।
18हे नानक ! प्रभु के चरण-स्पर्श कर तथा चिन्ता छोड़कर अचिंत रह॥ २१॥
19श्लोक महला ३॥
20सारा जगत आशा करता हुआ मर मिट जाता है परन्तु आशा नहीं मरती।
21हे नानक ! सत्यस्वरूप परमात्मा के साथ चित्त लगाने से सब आशाएँ पूरी हो जाती हैं।॥ १॥
22महला ३ ॥
23आशा-अभिलाषा तब मिट जाएँगी, जब इन्हें पैदा करने वाला भगवान इनका विनाश कर देगा।
24हे नानक ! हरि के नाम के अलावा कोई भी वस्तु अनश्वर नहीं ॥ २॥
25पउड़ी॥
26भगवान ने स्वयं ही पूर्ण ढांचा बनाकर जगत की रचना की है।
27वह स्वयं ही साहूकार है, स्वयं ही व्यापारी एवं स्वयं ही हाट बाजार है।
28वह आप ही सागर, आप ही जहाज और आप ही खेवट है।
29वह आप ही गुरु एवं आप ही चेला है और आप ही घाट दिखाता है।
30हे नानक ! तू उस परमात्मा का नाम-स्मरण कर और अपने सारे पाप दूर कर ले॥ २२॥ १॥ शुद्ध।
31रागु गूजरी वार महला ५
32ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
33श्लोक महला ५॥
34अपने अन्तर्मन में गुरु की आराधना करो और जिह्म से गुरु के नाम का जाप करो।
35अपने नेत्रों से सच्चे गुरु के दर्शन करो तथा कानों से गुरु का नाम सुनो।
36सतिगुरु के प्रेम में रंग जाने से तुझे प्रभु के दरबार में आश्रय मिल जाएगा।
37हे नानक ! जिस पर प्रभु-कृपा करता है, उसे ही यह अमूल्य वस्तु देता है।
38कुछ विरले ही व्यक्ति होते हैं जो इस जगत में उत्तम कहलाते हैं।॥ १॥
39महला ५॥
40रक्षक प्रभु ने मेरी रक्षा की है और उसने स्वयं ही बचाकर मेरा कल्याण कर दिया है।
41गुरु के चरणों में लगने से मेरे कार्य सम्पूर्ण हो गए हैं।
42जब प्रभु स्वयं दयालु हो गया है तो में अपने मन से उसे विस्मृत नहीं करता।
43संतजनों की संगति में रहकर भवसागर से पार हो गया हूँ।
44शाक्त, निन्दकों एवं दुष्टों का प्रभु ने क्षण में ही नाश कर दिया है।
45नानक के मन में उस मालिक की टेक है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं