सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 515 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji

1हमें उसका ही गुणगान करना चाहिए जो सब जीवों में समाया हुआ है।

2जो हमें भोजन प्रदान करता है, उसे ही वाह-वाह कहना चाहिए।

3हे नानक ! वाह-वाह करके उस एक ईश्वर की ही प्रशंसा करनी चाहिए, जिसके सतिगुरु ने दर्शन करवाए हैं॥ १॥

4महला ३॥

5गुरुमुख व्यक्ति सदैव ही अपने प्रभु की वाह-वाह (स्तुतिगान) करते हैं और मनमुख मोह-माया रूपी विष सेवन करके मर जाते हैं।

6उन्हें वाह-वाह (स्तुतिगान) करना अच्छा नहीं लगता इसलिए उनका सारा जीवन दुख में ही व्यतीत होता है।

7गुरुमुख नामामृत पान करते हैं और अपनी सुरति लगाकर परमात्मा की स्तुति करते रहते हैं।

8हे नानक ! जो व्यक्ति भगवान की स्तुति करते हैं, वे निर्मल हो जाते हैं और उन्हें तीन लोकों का ज्ञान हो जाता है॥ २ ॥

9पउड़ी॥

10परमात्मा की इच्छा से ही गुरु मिलता है और गुरु की सेवा करने से प्रभु-भक्ति की युक्ति बनती है।

11ईश्वरेच्छा से ही हरि प्राणी के मन में निवास करता है और सहज ही हरि-रस का पान करता है।

12परमात्मा की मर्जी से ही मनुष्य को सुख प्राप्त होता है और नित्य ही नाम रूपी लाभ की उपलिब्ध होती है।

13उस पवित्र पुरुष को हरि के राजसिंहासन पर विराजमान किया जाता है और वह सदा अपने घर में रहता है।

14ईश्वरेच्छा को वही सहर्ष स्वीकार करते हैं, जिन्हें गुरु मिल जाता है॥ १६॥

15श्लोक महला ३॥

16जिन्हें परमात्मा आप समझ प्रदान करता है, वे जीव सदा वाह-वाह (स्तुतिगान) करते रहते हैं।

17भगवान का गुणगान करने से मन निर्मल हो जाता है और अन्तर्मन से अहंकार दूर हो जाता है।

18गुरु का शिष्य जो नित्य ही प्रभु की स्तुति करता है, वह मनोवांछेित फल प्राप्त कर लेता है।

19जो हरि की स्तुति करते हैं, वे सेवक सुन्दर हैं। हे हरि ! मेरा मिलन उनसे करवा दे,

20ताकि मैं अपने हृदय में स्तुति करता रहूँ और अपने मुख से भी तेरा गुणगान ही उच्चरित करता रहूँ।

21हे नानक ! जो व्यक्ति परमात्मा की प्रशंसा करते हैं, मैं अपना तन-मन उनको न्यौछावर करता हूँ॥ १॥

22महला ३॥

23मेरा सत्यस्वरूप मालिक धन्य-धन्य है, जिसका नाम अमृत रूप है।

24जिन्होंने मेरे मालिक-प्रभु की सेवा-भक्ति की है, उन्हें नाम-फल की प्राप्ति हो गई है, मैं उन महापुरुषों पर बलिहारी जाता हूँ।

25ईश्वर गुणों का भण्डार है, जिसे वह यह भण्डार देता है, वही इसे चखता है।

26परमात्मा जल एवं धरती में सर्वव्यापक है और गुरुमुख बनकर ही उसे पाया जाता है।

27हे गुरु के शिष्यो ! नित्य ही सभी परमात्मा की स्तुति करो। पूर्ण गुरु को प्रभु की महिमा अच्छी लगती है।

28हे नानक ! जो मनुष्य अपने मन एवं चित्त से प्रभु का गुणगान करता है, उसके निकट यमदूत नहीं आता॥ २॥

29पउड़ी ॥

30पूज्य परमेश्वर परम-सत्य है तथा गुरु की सच्ची वाणी भी उसके यश में है।

31सतगुरु के माध्यम से सत्य की पहचान होती है और मनुष्य सहज ही सत्य में समा जाता है।

32ऐसे पवित्र पुरुष रात-दिन जाग्रत रहते हैं, वे सोते नहीं और जागते ही उनकी जीवन-रात्रि व्यतीत होती है।

33जो गुरु की शिक्षा द्वारा हरि रस को चखते हैं, वे प्राणी पुण्य के पात्र हैं।

34गुरु के बिना किसी को भी परमात्मा प्राप्त नहीं हुआ और मुर्ख लोग खप-खपकर मर जाते है।

35श्लोक महला ३॥

36उस निराकार परमात्मा की वाणी वाह ! वाह ! प्रशंसनीय है और उस जैसा महान् अन्य कोई नहीं।

37वह परम सत्य अगम्य एवं अथाह प्रभु धन्य ! धन्य ! है।

38वह बेपरवाह है, जो कुछ वह करता है, वही होता है।

39उसका नाम अमृत रूप है, जिसकी प्राप्ति गुरुमुख को ही होती है।

40प्रभु की स्तुति मनुष्य को अहोभाग्य से ही मिलती है और वह स्वयं ही दया करके इसे प्रदान करता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं