गुरु ग्रंथ साहिब 514 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji
1हे नानक ! मन के द्वारा मन को आत्मिक सुख मिलता है और फिर न ही कुछ मरता है, न ही जाता है॥ २॥
2पउड़ी।
3मानव शरीर एक अपार किला है जो संयोग से ही प्राप्त होता है।
4इस शरीर में स्वयं प्रभु निवास कर रहा है और वह स्वयं ही रस भोगी है।
5परमात्मा स्वयं अतीत एवं अलिप्त रहता है, वह योगी होने के बावजूद विरक्त है।
6जो उसे अच्छा लगता है, वह वही कुछ करता है और जो कुछ प्रभु करता है, वही होता है।
7गुरुमुख बनकर नाम की आराधना करने से प्रभु से विछोह मिट जाता है॥ १३॥
8श्लोक महला ३॥
9वह सत्यस्वरूप परमात्मा गुरु के शब्द द्वारा अपनी ‘वाह-वाह' (महिमा) करवाता है।
10कोई विरला गुरुमुख ही इस तथ्य को समझता है कि ‘वाह-वाह' प्रभु की उस्तति-महिमा है।
11यह सच्ची वाणी भी 'वाह-वाह' है, जिससे मनुष्य सत्य (प्रभु) को मिल जाता है।
12हे नानक ! वाह-वाह (स्तुतिगान) करते हुए ही परमात्मा के करम (कृपा) से ही उसको पाया जा सकता है ॥ १ ॥
13महला ३॥
14वाह-वाह (गुणानुवाद) करती हुई रसना गुरु-शब्द से सुन्दर लगती है।
15पूर्ण शब्द-गुरु द्वारा प्रभु आकर मनुष्य को मिल जाता है।
16भाग्यवान ही अपने मुख से भगवान की वाह-वाह (गुणगान) करते हैं।
17वे सेवक सुन्दर हैं, जो परमेश्वर की वाह-वाह (स्तुतिगान) करते हैं, प्रजा उनकी पूजा करने के लिए आती है।
18हे नानक ! करम से ही प्रभु की वाह-वाह (उस्तति) प्राप्त होती है और मनुष्य सच्चे द्वार पर शोभा पाता है॥ २॥
19पउड़ी॥
20काया रूपी दुर्ग के भीतर झूठ, फरेब एवं अभिमान के वज कपाट लगे हुए हैं।
21भ्रम में भूले हुए अन्धे एवं अज्ञानी स्वेच्छाचारी उनको देखते ही नहीं।
22वे किसी भी उपाय द्वारा कपाट ढूंढ नहीं पाते। भेषधारी भेष धारण कर-करके थक गए हैं।
23जो व्यक्ति हरि-नाम जपते हैं, गुरु के शब्द द्वारा उनके कपाट खुल जाते हैं।
24श्रीहरि अमृत का वृक्ष है, जो इस अमृत का पान करते हैं, वे तृप्त हो जाते हैं।॥ १४॥
25श्लोक महला ३॥
26वाह-वाह अर्थात् ईश्वर का गुणानुवाद करने से जीवन-रात्रि सुखद व्यतीत होती है।
27हे मेरी माँ! ईश्वर का गुणगान करने से मनुष्य सदा आनंद में रहता है।
28वाह-वाह (स्तुतिगान) करने से मनुष्य की सुरति हरि के साथ लगी रहती है।
29प्रभु की कृपा से ही मनुष्य ‘वाह-वाह' की वाणी बोलता एवं बुलवाता है।
30वाह-वाह (प्रभु की उस्तति) करने से मनुष्य को लोक-परलोक में शोभा मिलती है।
31नानक ! इन्सान सच्चे प्रभु की इच्छा में ही वाह-वाह (स्तुतिगान) करता है॥ १॥
32महला ३॥
33वाह-वाह की वाणी सत्य है, जिसे गुरुमुख बनकर मनुष्य ढूंढ लेता है।
34वाह-वाह का उच्चारण गुरु के शब्द से हृदय से करना चाहिए।
35वाह-वाह करते हुए गुरुमुख अपनी खोज द्वारा सहज ही प्रभु को प्राप्त कर लेते हैं।
36हे नानक ! वे व्यक्ति खुशकिस्मत हैं, जो भगवान को हृदय में स्मरण करते हैं॥ २ ॥
37पउड़ी।
38यह मन अत्यंत लोभी है जो नित्य ही लोभ में आसक्त रहता है।
39मोहिनी माया की तृष्णा में मन दसों दिशाओं में भटकता फिरता है।
40आगे परलोक में बड़ा नाम एवं जाति (कुलीनता) साथ नहीं जाते। मनमुख मनुष्य को दु:ख ही निगल जाता है,
41क्योंकि उसकी जिव्हा हरि-रस का पान नहीं करती और कटु वचन ही बोलती है।
42जो मनुष्य गुरु के सान्निध्य में रहकर नामामृत का पान करते हैं, वे सेवक तृप्त रहते हैं।॥ १५ ॥
43श्लोक महला ३ ॥
44वाह-वाह उसे कहना चाहिए जो सत्यस्वरूप एवं गहन-गंभीर है।
45वाह-वाह उसे ही कहना चाहिए जो गुणदाता एवं धैर्य-बुद्धि प्रदान करने वाला है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं