गुरु ग्रंथ साहिब 513 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji
1हे नानक ! गुरुमुख मनुष्य संसार सागर से पार हो जाते हैं, उन्हें करतार प्रभु अपने साथ मिला लेता है॥ २॥
2पउड़ी।
3भक्त सच्चे परमात्मा के द्वार पर बैठे बड़े शोभा देते हैं। वे सच्चे शब्द द्वारा ही स्थिर रहते हैं।
4हरि की प्रीति उनके भीतर उत्पन्न हो जाती है और हरि के प्रेम में आकर्षित रहते हैं।
5वे हमेशा हरि के रंग में मग्न रहते हैं और उनकी जिव्हा हरि रस का पान करती है।
6जो लोग गुरु की शरणागत पूज्य परमेश्वर को पहचानते हैं और उसे अपने हृदय में बसाते हैं, उनका जीवन सफल है।
7गुरु के बिना दुनिया रोती फिरती है और मोह-माया में फँसकर नष्ट हो रही है॥ ११॥
8श्लोक महला ३॥
9इस कलियुग में भक्तों ने ही भगवान की भक्ति करके नाम-भण्डार प्राप्त किया है और प्रभु के उत्तम पद को पाया है।
10सतिगुरु की सेवा करके उन्होंने हरि के नाम को अपने मन में बसा लिया है और रात-दिन नाम का ही ध्यान किया है।
11अपने घर में ही वे गुरु के उपदेश द्वारा निर्लिप्त रहते हैं तथा अपने अहंत्व एवं मोह को जला दिया है।
12सतगुरु स्वयं संसार-सागर से पार हुआ है और उसने समूचे जगत को भी भवसागर से तार दिया है, वह माता धन्य है जिसने उन्हें जन्म दिया है।
13ऐसा सतिगुरु उसे ही प्राप्त होता है, जिसके मस्तक पर प्रभु ने प्रारम्भ से ऐसा लेख लिख दिया है।
14नानक अपने गुरु पर बलिहारी है, जिसने दुविधा में भटके हुए को सन्मार्ग लगाया है। ॥१॥
15महला ३॥
16त्रिगुणात्मक माया को देखकर मनुष्य ऐसे कुमार्गगामी हो जाता है जैसे दीपक को देखकर पतंगा नाश हो जाता है।
17पण्डित बार-बार माया के लोभ में आकर्षित होकर दैखता रहता है कि किसी ने उसके समक्ष कुछ भेंट रखी है अथवा नहीं।
18द्वैतभाव की प्रीति में पथभ्रष्ट हुआ वह नित्य पाप बारे पढ़ता है और प्रभु ने उसे अपने नाम से वंचित किया हुआ है।
19योगी, जंगम एवं संन्यासी भी भूले हुए हैं, क्योंकि उन्होंने अपना अहंकार एवं गर्व बहुत बढ़ाया हुआ है।
20वस्त्र एवं भोजन की सच्ची भिक्षा को वे स्वीकृत नहीं करते और अपने मन के हठ के कारण अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा लेतै हैं।
21इनमें से केवल वही सेवक महान् है जो गुरु के सान्निध्य में रहकर नाम का ध्यान करता है।
22हे नानक ! किसै कहकर पुकार करें, जबकि सबकुछ करने कराने वाला सृष्टिकर्ता ही है॥ २॥
23पउड़ी ॥
24माया-मोह, काम, कोध एवं अहंकार इत्यादि भयानक प्रेत हैं।
25ये सब यमराज की प्रजा हैं और इन पर यमराज का सख्त दण्ड कायम रहता है।
26स्वेच्छाचारी मनुष्य जो मोह-माया से प्रेम करते हैं, वह यमराज के मार्ग पर धकेले जाते हैं।
27स्वेच्छाचारी यमपुरी में बंधे हुए पीटे जाते हैं और कोई भी उनकी पुकार नहीं सुनता।
28जिस पर प्रभु कृपा करता है, उसे गुरु मिल जाता है और गुरु के सान्निध्य में रहकर प्राणी की मुक्ति हो जाती है॥ १२॥
29श्लोक महला ३ ॥
30अहंत्व एवं ममता पैदा करने वाली माया ऐसी मोहिनी है जो स्वेच्छाचारियों को निगल गई है।
31जो अपना चित्त द्वैतवाद के मोह में लगाते हैं, यह माया उनके साथ लिपटकर उन्हें वश में कर लेती है।
32यदि गुरु के शब्द द्वारा इसे जला दिया जाए तो यह तभी अन्तर से निकलती है।
33इस प्रकार तन, मन उज्जवल हो जाते हैं और नाम आकर मन में निवास कर लेता है।
34हे नानक ! हरि का नाम इस माया का मारण है जो गुरु के माध्यम से प्राप्त हो सकता है॥ १॥
35महला ३॥
36यह मन अनेक युगों में भटकता रहा है। यह स्थिर नहीं होता और जन्मता-मरता रहता है।
37जब हरि को अच्छा लगता है तो वह मन को भटकाता है और उसने ही यह परपंच बनाकर यह खेल रचा है।
38जब हरि मन को क्षमा कर देता है तो ही गुरु मिलता है और स्थिर होकर मन सत्य में विलीन हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं