गुरु ग्रंथ साहिब 512 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji
1सुखों का दाता हरि मन में निवास कर जाएगा और अभिमान एवं घमण्ड नाश हो जाएगा।
2हे नानक ! जब प्रभु कृपा-दृष्टि करता है तो प्राणी का ध्यान रात-दिन सत्य में ही लगा रहता है॥ २ ॥
3पउड़ी॥
4गुरुमुख मनुष्य पवित्र-पावन है और सत्य एवं संतोष का रूप है उसे सब सत्य ही दिखाई देता है।
5उसके अन्तर्मन से छल-कपट एवं विकार नाश हो जाते हैं और उसने सहज ही मन को जीत लिया होता है।
6उसके मन में प्रभु-ज्योति का प्रकाश हो जाता है, वह हरि रस का आनंद लेता रहता और उसका अज्ञान दूर हो जाता है।
7वह नित्य ही हरि का गुणगान करता रहता है, जो गुण उसके भीतर हरि ने प्रगट कर दिए हैं।
8सब जीवों का दाता एक परमात्मा ही सबका मित्र हे॥ ६॥
9श्लोक महला ३ ॥
10जो व्यक्ति ब्रह्म को जानता है, उसे ही ब्राहाण कहा जाता है और वह रात-दिन परमात्मा में अपनी सुरति लगाकर रखता है।
11वह सतगुरु की सलाह अनुसार सत्य एवं संयम का आचरण करता है और उसका अहंकार का रोग नाश हो जाता है।
12वह हरि का गुणगान करता है, हरि का यश ही संग्रह करता है और उसकी ज्योति परमज्योति में विलीन हो जाती है।
13इस जग में कोई विरला ही ब्रह्मज्ञानी है, जो अपना अहंकार मिटा कर प्रभु में विलीन होता है।
14हे नानक ! उसे मिलने से सदैव सुख प्राप्त होता है, जो रात-दिन हरि-नाम की आराधना करता रहता है॥ १॥
15महला ३॥
16अज्ञानी मनमुख के हृदय में छल-कपट है और अपनी जीभ से वह झूठ ही बोलता है।
17छल-कपट करने से परमात्मा खुश नहीं होता, क्योंकि वह सहज स्वभाव नित्य ही सभी को देखता एवं सुनता है।
18स्वेच्छाचारी मनुष्य द्वैतभाव में फँसकर जगत को उपदेश देता है किन्तु आप विषैली माया के मोह एवं स्वाद में क्रियाशील रहता है।
19ऐसा करने से वह सदा दुःख ही भोगता है और वह जन्मता-मरता एवं बार-बार योनियों में फँसकर इहलोक में आता-जाता रहता है।
20उसकी दुविधा उसे बिल्कुल नहीं छोड़ती और विष्टा में ही वह गल-सड़ जाता है।
21जिस पर मेरा स्वामी कृपा करता है, उसे गुरु की शिक्षा सुनवाता है।
22फिर ऐसा मनुष्य हरि-नाम का ध्यान करता है, हरि-नाम का वह गुणगान करता है और हरि का नाम ही अंत में उसे मोक्ष प्रदान करता है॥ २॥
23पउड़ी।
24परमात्मा जिन से अपनी आज्ञा का पालन करवाता है, वही इस दुनिया में पूर्णपुरुष हैं।
25वह अपने मालिक की सेवा करते हैं और गुरु के पूर्ण शब्द का विचार करते हैं।
26वह हरि की उपासना करते हैं और सत्यनाम से प्रीति लगाते हैं।
27जो मनुष्य अपने भीतर से अहंकार को नाश कर देते हैं, वे हरि के महल (दरबार) को प्राप्त कर लेते हैं।
28हे नानक ! हरि का नाम-सिमरन करने एवं उसे हृदय में धारण करने से गुरुमुख हरि से मिले रहते हैं।॥ १०॥
29श्लोक महला ३॥
30गुरुमुख व्यक्ति प्रभु का ध्यान करते हैं और उनकी अन्तरात्मा में सहज ध्वनि उत्पन्न होती है। वे अपना चित्त सत्यनाम के साथ ही लगाते हैं।
31गुरुमुख व्यक्ति रात-दिन प्रभु के प्रेम-रंग में अनुरक्त रहते हैं और हरि का नाम ही उनके मन को अच्छा लगता है।
32गुरुमुख हरि को ही देखते हैं और हरि के बारे में ही बचन करते हैं और सहज स्वभाव प्रभु से प्रेम पाते हैं।
33हे नानक ! गुरुमुख मनुष्य को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसका अज्ञान रूपी घोर अन्धकार नष्ट हो जाता है।
34जिस पर पूर्ण प्रभु की अनुकंपा होती है, वह गुरु के सान्निध्य में रहकर हरि-नाम की आराधना करता है॥ १॥
35महला ३॥
36जो सतगुरु की सेवा नहीं करते, शब्द से प्रेम नहीं लगाते तथा
37सहजता में नाम की आराधना भी नहीं करते, फिर वे किसलिए इस संसार में आए हैं।
38ऐसे व्यक्ति पुनः पुनः योनियों के चक्र में पड़ते है और हमेशा ही विष्टा में खराब होते हैं।
39वे तो झूठे लालच से लगे हुए हैं और वे न इस किनारे पर हैं और न ही पार हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं