गुरु ग्रंथ साहिब 511 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji
1यह शरीर तो मिट्टी है, अन्धा अर्थात् ज्ञानहीन है।
2यदि जीवात्मा से पूछा जाए तो जीवात्मा कहती है कि मुझे तो मोह-माया ने आकर्षित किया हुआ है, इसलिए मैं बार-बार संसार में आती-जाती रहती हूँ।
3हे नानक ! जीवात्मा संबोधन करती है कि मैं अपने पति-प्रभु के हुक्म को नहीं जानती, जिससे मैं सत्य में समा जाती ॥ १॥
4महला ३॥
5एक ईश्वर का नाम-धन ही शाश्वत है, अन्य सांसारिक धन तो आता-जाता रहता है।
6इस नाम-धन पर चोर कुदृष्टि नहीं रख सकता और न ही कोई उचक्का ले जा सकता है।
7हरि का नाम रूपी यह धन आत्मा के साथ ही बस्रता है और आत्मा के साथ ही परलोक में जाता है।
8लेकिन यह अमूल्य नाम धन पूर्ण गुरु से ही प्राप्त होता है तथा स्वेच्छाचारी लोगों को यह धन प्राप्त नहीं होता।
9हे नानक ! वे व्यापारी धन्य हैं, जिन्होंने संसार में आकर हरि के नाम-धन को अर्जित किया है।॥ २ ॥
10पउड़ी ॥
11मेरा परमेश्वर बड़ा महान् है, वह सदैव सत्य एवं गहन-गंभीर है।
12समूचा जगत उसके वश में है और सारी शक्ति उसी की है।
13गुरु की कृपा से ही सदैव अटल एवं धैर्यवान हरि का नाम-धन प्राप्त होता है।
14यदि शूरवीर गुरु से भेंट हो जाए तो उसकी कृपा से हरि प्राणी के मन में निवास कर जाता है।
15गुणवान लोग ही सदा अटल एवं पूर्ण हरि की सराहना करते हैं।॥ ७ ॥
16श्लोक महला ३॥
17उन मनुष्यों के जीवन को धिक्कार है, जो हरि-नाम स्मरण के सुख को त्याग देते हैं और अभिमान में पाप करके दुःख भोगते हैं।
18अज्ञानी-मनमुख माया के मोह में फँसे रहतें हैं और उन्हें कोई सूझ नहीं आती।
19इस लोक एवं परलोक में उन्हें सुख उपलब्ध नहीं होता और अंततः पछताते हुए चले जाते हैं।
20गुरु की कृपा से कोई विरला व्यक्ति ही नाम की आराधना करता है और उसके अन्तर्मन से अहंत्व दूर हो जाता है।
21हे नानक ! जिसके भाग्य में शुरु से लिखा होता है, वह गुरु के चरणों में आ जाता है॥ १॥
22महला ३॥
23मनमुख इन्सान उलटा पड़ा हुआ कमल है, उसके पास न ही भक्ति है और न ही प्रभु का नाम है।
24यह माया में ही क्रियाशील रहता है और झूठ ही उसका जीवन-मनोरथ होता है।
25उस मनमुख का अन्तर्मन भी स्नेह से नहीं भीगता, उसके मुँह से निकले वचन भी फीके (निरर्थक) ही होते हैं।
26ऐसे लोग धर्म में मिलाने पर भी धर्म से दूर रहते हैं और उनके भीतर झूठ एवं मक्कारी विद्यमान होती है।
27हे नानक ! विश्व रचयिता प्रभु ने ऐसी रचना रची है कि मनमुख झूठ बोल-बोलकर डूब गए हैं और गुरुमुख हरिनाम का जाप करके संसार-सागर से पार हो गए है ॥ २॥
28पउड़ी।
29सत्य को समझे बिना आवागमन का लम्बा चक्र लगाना पड़ता है, मनुष्य पुनः पुनः योनियों के चक्र में संसार में आता-जाता रहता है।
30वह गुरु की सेवा में तल्लीन नहीं होता, जिसके फलस्वरूप आखिर में पछताता हुआ जगत से चला जाता है।
31जब परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि करता है तो गुरु से मिलन हो जाता है और प्राणी का अहंत्व दूर हो जाता है।
32तब सांसारिक मोह की तृष्णा की भूख दूर हो जाती है और मन में आत्मिक सुख का निवास हो जाता है।
33अपने हृदय में प्रभु से लगन लगाकर सदैव ही उसकी स्तुति करनी चाहिए॥ ८ ॥
34श्लोक महला ३॥
35जो व्यक्ति अपने सतिगुरु की श्रद्धा से सेवा करता है, सभी उसकी पूजा करते हैं।
36सभी उपायों में श्रेष्ठ उपाय यह है केि हरि के नाम की प्राप्ति हो जाए।
37नाम का जाप करने से अन्तर्मन में शीतलता एवं शांति का निवास होता है और हृदय सदैव सुखी रहता है।
38हे नानक। नामामृत ही उसका भोजन एवं उसका पहरावा बन जाता है, नाम से ही उसे जगत में कीर्ति प्राप्त होती है।॥ १॥
39महला ३॥
40हे मेरे मन ! सच्चे गुरु की शिक्षा सुन, तुझे गुणों का भण्डार प्रभु प्राप्त हो जाएगा।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं