गुरु ग्रंथ साहिब 510 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji
1यह जीवात्मा तो सदा मुक्त है और सहज ही (प्रभु में) लीन रहती है॥ २॥
2पउड़ी ॥
3प्रभु ने संसार पैदा करके इसे अपने वश में किया हुआ है।
4प्रभु गणनाओं अर्थात् चतुराइयों से प्राप्त नहीं होता और मनुष्य तो द्वैतभाव में ही भटकता है।
5सतिगुरु को मिलने से मनुष्य जीवित ही (माया के त्याग से) मरा रहता है और इस रहस्य को समझने से वह सत्य में समा जाता है।
6शब्द के माध्यम से अहंकार मिट जाता है और प्राणी हरि के मिलन में मिल जाता है।
7प्रभु स्वयं ही सब कुछ जानता है और सब कुछ आप ही करता है। अपनी रचना को देखकर वह स्वयं ही प्रसन्न होता है॥ ४ ॥
8श्लोक महला ३॥
9जिस व्यक्ति ने सतगुरु से चित्त नहीं लगाया और न ही प्रभु के नाम ने मन में आकर निवास किया तो
10उसके इस जीवन को धिक्कार है। इस जगत में आकर उसने क्या लाभ प्राप्त किया है।
11माया एक खोटी पूँजी है और एक क्षण में ही इसका पाखण्ड प्रगट हो जाता है।
12जब यह मनुष्य के हाथ से निकल जाती है तो इसका बदन काला हो जाता है और चेहरा मुरझा जाता है।
13जिन्होंने अपना चित्त सतगुरु से लगाया है, उनके मन में सुख आकर बस जाता है।
14वे हरि के नाम का प्रेमपूर्वक सिमरन करते रहते हैं और हरि के नाम में ही वे लीन रहते हैं।
15हे नानक ! सतगुरु ने उन्हें वह नाम-धन सौंपा है, जो उनके मन में समाया रहता है।
16उन्हें प्रभु के प्रेम का गहरा रंग प्राप्त हुआ है, जिसका रंग दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है॥ १॥
17महला ३॥
18माया एक ऐसी नागिन है, जिसने सारे जगत को अपनी लपेट में लिया हुआ है।
19जो इसकी सेवा करता है, अन्ततः वह उसे ही निगल जाती है।
20कोई विरला ही गुरुमुख है जो इसके विष की औषधि रूपी मंत्र को जानता है। वह इसे मसल कर तथा कुचल कर अपने पैरों में डाल देता है।
21हे नानक ! इस माया-नागिन से वही बचते हैं जो सत्य के ध्यान में मग्न रहते हैं॥ २ ॥
22पउड़ी।
23जब ढाढी पुकार करता है तो प्रभु उसे सुनता है।
24उसके मन में धैर्य होता है और वह पूर्ण-प्रभु को प्राप्त कर लेता है।
25शुरु से जिसकी तकदीर में जैसा लेख लिखा होता है, मनुष्य वैसे ही कर्म करता है।
26जब पति-प्रभु दयालु हो जाता है तो वह प्रभु के महल में ही अपना सच्चा घर प्राप्त कर लेता है।
27वह मेरा प्रभु बहुत बड़ा है, जो गुरु के माध्यम से ही मिलता है॥ ५॥
28श्लोक महला ३॥
29सबका मालिक एक ईश्वर ही है, जो सदा ही साथ रहता है।
30हे नानक ! यदि जीव-स्त्री उसका हुक्म नहीं मानती तो उसके ह्रदय-घर में रहता हुआ प्रभु कहीं दूर ही लगता है।
31लेकिन जिन पर प्रभु दया-दृष्टि धारण करता है, वे उसके हुक्म का पालन करती हैं।
32जिसने पति-प्रभु के हुक्म को मानकर सुख की प्राप्ति की है, वही जीवात्मा उसकी प्यारी सुहागिन बन गई है।ll १ ॥
33महला ३॥
34जो जीवात्मा पति-प्रभु से प्रेम नहीं करती, वह रात भर विरह में जलती हुई मृत्यु को प्राप्त होती रहती है।
35हे नानक ! वही सुहागेिन (जीव-स्त्रियाँ) सुख में रहती हैं, जो परमात्मा से स्वच्चा प्रेम कायम करके उसे ही प्राप्त करती है॥ २ ॥
36पउड़ी ॥
37मैंने समूचा जगत घूमकर देख लिया है कि एक हरि ही सब जीवों का दाता है।
38किसी भी उपाय चतुराई इत्यादि से कर्मों का विधाता हरि पाया नहीं जा सकता।
39गुरु के शब्द द्वारा हरि-प्रभु मनुष्य के मन में निवास कर जाता है और सहज ही वह जाना जाता है।
40उसके भीतर से तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है और वइ हरि नामामृत के सरोवर में स्नान कर लेता है।
41उस महान् परमात्मा की बड़ी बड़ाई है कि वह अपनी गुणस्तुति भी गुरुमुखों से करवाता है॥ ६॥
42श्लोक महला ३॥
43शरीर एवं आत्मा की कैसी प्रीति है जो अन्तकाल में इस पार्थिव शरीर को त्याग कर आत्मा चली जाती है।
44जब चलते समय यह शरीर साथ नहीं जाता तो इसे झूठ बोल-बोलकर क्यों खिलाया जाए अर्थात् झूठ बोल कर पालने का क्या लाभ ?
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं