सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 50 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji

1सतिगुरु गहन, गंभीर एवं सुखों का सागर हैं और समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

2जिस प्राणी ने अपने गुरु की सेवा का फल प्राप्त किया है, उसे यमदूतों का कदापि दंड नहीं मिलता अपितु वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

3गुरु के बराबर कोई भी समर्थ नहीं, क्योंकि मैंने यह सारा ब्रह्माण्ड खोजकर देख लिया है।

4सतिगुरु ने नाम का खजाना प्रदान कर दिया है और उस द्वारा नानक ने अपने चित्त के भीतर सुख धारण कर लिया है ॥४॥२०॥६०॥

5श्रीरागु महला ५ ॥

6प्राणी सांसारिक रसों को बड़ा मीठा समझकर भोगता है परन्तु उनका स्वाद बड़ा कटु निकलता है।

7भाई, मित्र से सुहृद करके व्यर्थ का विवाद उत्पन्न कर लिया है और तुम व्यर्थ ही पापों में ग्रस्त हो गए हो।

8अलोप होते इनको विलम्ब नहीं होता, नाम के अतिरिक्त सब नश्वर है, व्यक्ति दुख में चूर-चूर हो जाता है॥१॥

9हे मेरे मन ! सतिगुरु की सेवा में लीन हो जाओ।

10दुनिया में जो कुछ दिखाई देता है, वह समस्त नश्वर हो जाएगा। हे प्राणी ! तू मन की चतुरता को त्याग दे॥१॥ रहाउ ॥

11यह मन इतना दुःशील है कि पागल कुत्ते की भाँति दसों-दिशाओं में भागता तथा भटकता फिरता है।

12इसी तरह लालची प्राणी कुछ भी ध्यान नहीं करता। लोभी पशु की तरह खाद्य तथा अखाद्य सबको ग्रहण कर लेता है।

13प्राणी काम, क्रोध तथा अहंकार के नशे में लीन होकर बार-बार योनियों में पड़ता है II२II

14माया ने अपना जाल (फांसने का) बिछा रखा है और इस जाल में तृष्णा रूपी दाना भी रख दिया है।

15हे मेरी माता ! लालची पक्षी (प्राणी) इसके भीतर वहाँ फँस जाता है और निकल नहीं पाता।

16मनुष्य उसको नहीं पहचानता जिस सृष्टिकर्ता ने इसकी रचना की है और पुनःपुनः आवागमन में भटकता फिरता है॥ ३॥

17माया ने इस विश्व को विभिन्न विधियों एवं अनेको ढंगों से मोह कर रखा हुआ है।

18जिसकी अपार एवं समर्थ अकालपुरुष रक्षा करता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।

19हे नानक ! प्रभु भक्तों पर मैं सदैव न्यौछावर हूँ, जो भगवान में सुरति लगाने के कारण भवसागर से पार हो गए हैं II४ II२१॥९ १॥

20श्रीरागु महला ५ घरु २ ॥

21ग्वाला अपनी गायें लेकर थोड़ी देर के लिए चरागाह में आता है। उसका वहाँ आडम्बर करने का क्या अभिप्राय है?

22हे प्राणी ! जब तेरा इस दुनिया में आने का समय खत्म हो जाएगा, तब तूने यहाँ से चले जाना है। इसलिए अपने वास्तविक घर प्रभु-चरणों को याद रख॥१॥

23हे मेरे मन ! भगवान का गुणगान करो तथा प्रेम से सतिगुरु की सेवा का फल प्राप्त करो।

24तुम थोड़े समय के लिए मिले इस जीवन का अहंकार क्यों करते हो?॥१॥ रहाउ॥

25रात्रिकाल के अतिथि की तरह तुम सुबह-सवेरे उठकर गमन कर जाओगे।

26हे प्राणी ! तुम अपने गृहस्थ के साथ क्यों मोहित हुए फिरते हो? क्योंकि सृष्टि के समस्त पदार्थ उद्यान के पुष्पों की भांति क्षणभंगुर हैं।॥ २॥

27हे प्राणी ! तुम यह क्यों कहते फिरते हो कि ‘यह मेरा है, वो मेरा है।' उस ईश्वर को स्मरण कर, जिसने यह सबकुछ तुझे प्रदान किया है।

28हे प्राणी ! तुम इस नश्वर संसार से अवश्य ही गमन कर जाओगे (जब मृत्युकाल की अवधि आएगी और लाखों, करोड़ों अमूल्य पदार्थ सब कुछ त्याग कर ही जाओगे)॥ ३॥

29हे प्राणी ! चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् तूने यह दुर्लभ मानव जन्म प्राप्त किया है।

30हे नानक ! तू नाम का सिमरन किया कर क्योंकि तेरा इस संसार को छोड़ने का दिवस निकट आ गया है II४ II२२ ॥९२॥

31श्रीरागु महला ५ ॥

32हे शरीर रूपी स्त्री ! तू तब तक ही इस दुनिया में सुखी है, जब तक तेरा साथी (आत्मा) तेरे साथ है।

33जब आत्मा रूपी साथी निकल जाएगा, यह शरीर रूपी स्त्री मिट्टी में मिल जाएगी ॥१॥

34हे प्रभु ! मेरा मन सांसारिक तृष्णाओं से विरक्त हो गया है और तेरे दर्शनों की तीव्र अभिलाषा है।

35हे प्रभु ! आपका वह निवास स्थान धन्य है ॥१॥ रहाउ ॥

36हे शरीर रूपी स्त्री ! जब तक तेरा मालिक (आत्मा) तेरे ह्रदय में रहता है, तब तक सभी लोग तुझे ‘जी-जी' कहते हैं अर्थात आदर-सत्कार करते हैं।

37जब उस देहि से प्राण निकल जाते हैं तो देहि रूपी नारी को कोई भी नहीं पूछता। तदुपरांत पार्थिव शरीर को सभी हटाने के लिए कहेंगे॥२॥

38बाबुल के घर (इस संसार) में अपने पति-परमेश्वर की सेवा करो और ससुराल (परलोक) सुख में निवास करो।

39गुरु की शरण में आकर शुभ आचरण एवं रहन-सहन की शिक्षा ग्रहण कर। फिर तुझे कदाचित दुखी नहीं होना पड़ेगा।॥३॥

40समस्त जीव स्त्रियों ने अपने पति-परमेश्वर के घर (परलोक में) जाना है और सभी का विवाह उपरांत गौना (विदायगी) होनी है। अर्थात् सभी प्राणियों ने इस संसार में आकर मृत्यु के उपरांत परलोक गमन करना है, इसलिए इस संसार में अपने पिया प्रभु की स्तुति अवश्य करनी चाहिए ताकि उसके घर (परलोक) में स्थान प्राप्त हो। ?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं