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गुरु ग्रंथ साहिब 509 · Raag Gujri · Guru Amar Daas Ji

1हे नानक ! वे हरेि के नाम को प्राप्त नहीं करते एवं अपना अनमोल जन्म व्यर्थ ही गंवा देते हैं, इसलिए यमदूत उन्हें दण्ड देकर अपमानित करता है॥ २ ॥

2पउड़ी।

3जब परमात्मा ने अपने आपकों उत्पन्न किया, तब दूसरा कोई नहीं था।

4वह अपने आप से ही तब सलाह-मशवरा करता था। वह जो कुछ करता था, वही होता था।

5तब न ही आकाश था, न ही पाताल था और न ही तीन लोक थे।

6तब केवल निराकार प्रभु आप ही विद्यमान था और कोई उत्पत्ति नहीं हुई थी।

7जैसे उसे अच्छा लगता था, वैसे ही वह करता था एवं उसके अलावा दूसरा कोई नहीं था ॥ १॥

8श्लोक महला ३ ॥

9मेरा साहिब परमात्मा सदा अमर है लेकिन उसके दर्शन ‘शब्द' की साधना से होते हैं।

10वह अनश्वर है और जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता (अर्थात् न ही जन्म लेता है और न ही मरता है।)

11सदैव ही उस प्रभु का सिमरन करना चाहिए जो प्रत्येक हृदय में समा रहा है।

12किसी दूसरे की क्यों सेवा-भक्ति करें ? जो जन्मता और मर जाता है।

13उनका जीवन निष्फल है जो अपने मालिक-प्रभु को नहीं जानते तथा अपना चित्त दूसरों में लगाते हैं।

14हे नानक ! इस बात का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता कि विश्व का रचयिता उन्हें कितनी सजा देगा ? ॥ १॥

15महला ३ ॥

16परमेश्वर सर्वव्यापक है, इसलिए उस परम-सत्य का नाम-सिमरन करना चाहिए।

17हे नानक ! प्रभु का हुक्म समझने से मनुष्य उसके दरबार में स्वीकार हो जाता है और तब उसे सत्य रूपी फल मिल जाता है।

18किन्तु जो लोग निरर्थक बातें ही करते रहते हैं, प्रभु के मूल हुक्म को नहीं बूझते, वे ज्ञानहीन हैं तथा झूठी बातें ही करने वाले हैं।॥ २॥

19पउड़ी॥

20परमात्मा ने संयोग एवं वियोग का नियम बनाकर सृष्टि के मूल सिद्धांत की सृजना कर दी।

21अपने हुक्म-अनुसार उसने सृष्टि की रचना की और जीवों में अपनी ज्योति प्रज्वलित कर दी।

22सच्चे गुरु ने यह शब्द सुनाया है कि ज्योति स्वरूप प्रभु की ज्योति से ही सारा प्रकाश उत्पन्न होता है।

23परमात्मा ने ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवजी की उत्पत्ति करके उन्हें त्रिगुणात्मक-(सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण) कार्यों में लगा दिया।

24प्रभु ने संयोग-वियोग रूपी माया का मूल रच दिया है। इस माया में रहकर ही मनुष्य ने तुरीयावस्था में पहुँचकर सुख प्राप्त किया है॥ २॥

25श्लोक महला ३॥

26जो सच्चे गुरु को अच्छा लगता है, वही जप एवं वहीं तप है।

27सतिगुरु की रज़ा अनुसार अनुसरण करने से जीव मान-सम्मान प्राप्त करता है।

28हे नानक ! वह अभिमान को छोड़कर गुरु में ही समा जाता है।॥ १॥

29महला ३॥

30गुरु की शिक्षा कोई विरला जीव ही ग्रहण करता है।

31हे नानक ! गुरु-शिक्षा उसे ही प्राप्त होती है, जिसे प्रभु आप बड़ाई देता है॥ २॥

32पउड़ी ॥

33माया-मोह तथा अज्ञान का सागर अत्यंत भारी एवं विषम है।

34यदि जीवन की नैया पाप रूपी पत्थरों से अत्याधिक लदी हुई है तो यह संसार-सागर से कैसे पार होगी ?

35लेकिन जो दिन-रात भक्ति में मग्न रहते हैं, हरि उन्हें संसार-सागर से पार कर देता है।

36गुरु के शब्द द्वारा यदि मनुष्य अभिमान एवं विकारों को छोड़ देता है तो मन निर्मल हो जाता है।

37परमात्मा का नाम-सिमरन करते रहना चाहिए, क्योंकि परमात्मा का नाम उद्धार करने वाला है॥ ३॥

38श्लोक ॥

39हे कबीर ! मुक्ति का द्वार राई के दाने के दसवें भाग के समान संकुचित है।

40यह मन मस्त हाथी बना हुआ है, फिर यह कैसे उस में से निकल सकता है ?

41यदि ऐसा सच्चा गुरु मिल जाए जो परम प्रसन्न होकर दया-दृष्टि कर दे तो

42मुक्ति का द्वार बहुत खुला हो जाता है और सहज ही आया-जाया जा सकता है॥ १॥

43महला ३॥

44हे नानक ! मुक्ति का द्वार बहुत ही छोटा है परन्तु वही निकल सकता है जो बहुत छोटा अर्थात् विनीत हो जाए।

45अहंकार करने से मन अस्थूल हो गया है फिर यह कैसे इसमें से गुजर सकता है ?

46सतिगुरु को मिलने से अहंकार दूर हो जाता है और प्रभु की ज्योति प्राणी के भीतर आ जाती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं