गुरु ग्रंथ साहिब 508 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji
1हे स्वामी ! जैसे तुम बुलाते हो, वैसे ही हम बोलते हैं, अन्यथा हमारी क्या समर्था है कि हम कुछ बोल सकें ?
2सत्संगति में नानक ने वही यशोगान किया है, जो प्रभु को अत्यंत प्यारा है। ॥८॥१॥८॥
3गूजरी महला ५ घरु ४
4ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
5हे नाथ ! हे नरहरि (नृसिंह)! हे दीनबंधु! हे पतितपावन देव !
6हे भयनाशक ! हे कृपालु स्वामी ! हे गुणों के भण्डार ! तेरी सेवा-भक्ति बड़ी फलदायक है॥ १॥
7हे हरि ! हे गोपाल ! हे गुर गोबिन्द !
8मैंने तेरे सुन्दर चरणों की शरण ली है। हे दयालु केशव ! मुझे भयानक संसार-सागर से पार कर दो ॥ १॥ रहाउ॥
9हे काम-क्रोध का नाश करने वाले ! हे मोह के नशे का दहन करने वाले मुरारि ! हे मन के मकरंद !
10हे धरणिधर! हे परमानंद ! मेरा जन्म-मरण का चक्र मिटाकर मेरी लाज रखें।॥ २॥
11हे हरि ! माया-अग्नि की अनेक तरंगों में जलते हुए प्राणी के हृदय में गुरु-ज्ञान का मंत्र प्रदान करो।
12हे करुणामय प्रभु ! हे अनंत अकालपुरुष ! मेरी अहंबुद्धि का छेदन करके मेरी चिंता मिटा दो ॥ ३॥
13हे प्राणी ! हर पल एवं मुहूर्त तू समर्थ प्रभु का सिमरन कर और उसके ध्यान में सहज समाधि लगा।
14हे दीनदयालु ! हे पूर्ण प्रसन्न स्वामी ! मैं तुझ से साधुओं की चरण-धूलि माँगता हूँ॥ ४ ॥
15हे निरंकार हरि ! मिथ्या मोह, दुखदायक आशा, वासना एवं विकारों से मेरा धर्म बचा लीजिए तथा
16मेरे हृदय से भ्रम को दूर करके मेरा उद्धार कीजिए॥ ५ ॥
17हे हरि ! जिनके पास वस्त्र मात्र भी नहीं, वह तेरी नाम-निधि प्राप्त करके धनवान एवं खजाने से भरपूर हो जाते हैं।
18हे श्रीधर ! तेरी दयादृष्टि से महामूर्ख, दुर्जन एवं मूड़ भी गुणवान, बुद्धिमान एवं धैर्यवान बन जाते हैं।॥ ६॥
19हे मन ! जीवन से मुक्ति देने वाले जगदीश की आराधना कर और अपने हृदय में उसकी प्रीति धारण कर।
20जीवों पर दया एवं स्नेह करना तथा प्रभु को सर्वव्यापक अनुभव करना परमहंसों (गुरुमुखों) की जीवन-युक्ति है॥ ७॥
21ईश्वर उन्हें ही अपने दर्शन देता है, जो उसका यश सुनते हैं और अपनी जिह्म से उसका नाम उच्चरित करते हैं।
22वह भगवान को आस-पास समझ कर उसकी पूजा करते हैं। हे नानक ! प्रभु पतितों का भी उद्धार कर देता है॥८॥१॥२॥५॥१॥१॥२॥५७॥
23गूजरी की वार महला ३ सिकंदर बिराहिम की वार की धुनी गाउणी
24ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
25श्लोक महला ३॥
26यह जगत ममता में फँसकर मर रहा है और इसे जीने की विधि का कोई ज्ञान नहीं।
27जो व्यक्ति गुरु की रज़ा अनुसार आचरण करता है, उसे जीवन पदवी की उपलिब्ध होती है।
28जो प्राणी हरि के चरणों में अपना चित्त लगाते हैं, वे सदैव जीवित रहते हैं।
29हे नानक ! अपनी करुणा-दृष्टि से प्रभु मन में निवास करता है तथा गुरुमुख सहज ही समा जाता है॥ १॥
30महला ३॥
31जिन लोगों के मन में दुविधा एवं मोह-माया का दुख है, उन्होंने खुद ही दुनिया की उलझनों के साथ निपटना स्वीकार किया है।
32वे द्वैतभाव में सोए हुए कभी भी नहीं जागते, क्योंकि उनका माया से मोह एवं प्रेम बना हुआ है।
33वह प्रभु-नाम को स्मरण नहीं करते और न ही शब्द-गुरु का चिंतन करते हैं। स्वेच्छाचारियों का ऐसा जीवन-आचरण है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं