गुरु ग्रंथ साहिब 507 · Raag Gujri · Guru Raam Daas Ji
1सनक, सनंदन एवं नारद मुनि इत्यादि बनवारी प्रभु की सेवा-उपासना करते हैं और रात-दिन प्रभु-नाम का जाप करने में मग्न हैं।
2हे प्रभु ! जब भक्त प्रहलाद तेरी शरण में आया था तो तूने उसकी लाज रख ली थी॥ २॥
3अलख निरंजन एक ईश्वर ही सर्वव्यापक है तथा एक उसकी ज्योति ही समूची सृष्टि में प्रज्वलित हो रही है।
4हे प्रभु ! एक तू ही दाता है, शेष सभी याचक हैं, अपना हाथ फैलाकर सभी तुझसे दान मॉगते हैं।॥ ३॥
5भक्तजनों की वाणी सर्वोत्तम है। वे सदा प्रभु की निराली एवं अकथनीय कथा गायन करते रहते हैं।
6उनका जन्म सफल हो जाता है, वे स्वयं संसार-सागर से पार हो जाते हैं और अपनी कुल का भी उद्धार कर लेते हैं।॥ ४॥
7स्वेच्छाचारी लोग दुविधा एवं दुर्मति में फँसे हुए हैं। उनके भीतर सांसारिक मोह का अन्धेरा है।
8उन्हें सन्तजनों की कथा पसंद नहीं आती। इसलिए वे अपने परिवार सहित संसार-सागर में डूब जाते हैं।॥ ५॥
9निंदक निंदा करके दूसरों की मैल साफ करता है। वह मलभक्षी एवं मायाधारी है और
10संतजनों की निंदा करने में ही प्रवृत्त रहता है, इससे न वह इधर का होता है और न ही पार होता है॥ ६॥
11यह समूचा जगत का प्रपंच खेल रचनाकार ने ही रचा है तथा रचनाकार प्रभु ने ही सभी के भीतर अपनी सत्ता कायम की है।
12एक हरि-प्रभु का धागा ही जगत में क्रियाशील है। जब वह धागे को खींच लेता है तो सृष्टि का नाश हो जाता है और केवल एक ऑकार प्रभु ही रह जाता है॥ ७ ॥
13जो अपनी जीभ से स्वाद ले-लेकर हरि का गुणगान करते रहते हैं, उनकी जीभ हरि रस चखती रहती है।
14हे नानक ! हरि के अलावा मैं कुछ भी नहीं माँगता, क्योंकि हरि-रस की प्रीति ही मुझे प्यारी लगती है॥ ८॥ १॥ ७॥
15गूजरी महला ५ घरु २
16ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
17हे परमात्मा ! राजाओं में तुझे सबसे बड़ा राजा कहा जाता है तथा भूमिपतियों में तू सबसे बड़ा भूमिपति है।
18ठाकुरों में तुम्हारी ठकुराई का ही वर्चस्व है तथा कौमों में तुम्हारी सर्वोपरि कौम है॥ १ ॥
19मेरा पिता-प्रभु बड़ा धनवान एवं अगम्य स्वामी है।
20हे कर्तार ! मैं तेरी कौन-सी स्तुति का वर्णन करूँ ? तेरी लीला देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया हूँ॥ १॥ रहाउ॥
21हे प्रभु ! सुखी लोगों में तू सबसे बड़ा सुखी कहलवाता है और दानियों में महान् दानी है।
22तेजबानों में तू सबसे बड़ा महातेजस्वी कहलवाता है और रसियों में तू सर्वोच्च रसिया है॥ २॥
23हे स्वामी ! शूरवीरों में तू सबसे बड़ा शूरवीर कहलवाता है तथा भोगियों में तू महाभोगी है।
24गृहस्थियों में तू महान् गृहस्थी है (तुझ समान दूसरा कोई नहीं) तथा योगियों में तू महान् योगी है॥ ३॥
25हे ईश्वर ! रचनहारों में तू सबसे बड़ा रचयिता कहलवाता है तथा कर्मकाण्ड में भी तू सर्वोपरि है।
26हे दाता ! साहूकारों में भी तुम सच्चे साहूकार हो तथा व्यापारियों में महान् व्यापारी हो।॥ ४॥
27हे स्वामी ! दरबार लगाने वालों में भी तेरा ही सच्चा दरबार है तथा शरणागतों की प्रतिष्ठा रखने वालों में भी तुम सर्वोत्तम हो।
28तेरे पास कितनी लक्ष्मी-धन है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। तेरे पास कितने सिक्के हैं जो गणना से परे हैं।॥ ५॥
29हे सर्वेश्वर ! नामों में तेरा ही नाम श्रेष्ठ है (अर्थात् लोकप्रियता प्राप्त करने वालों में तुम्हारी ही लोकप्रियता है) तथा ज्ञानियों में तू महान् ज्ञानी है।
30समस्त युक्तियों में तुम्हारी ही युक्ति सर्वश्रेष्ठ है तथा सभी प्रकार के तीर्थ स्नानों में तुझ में किया हुआ स्नान महान् है॥ ६॥
31हे प्रभु ! सिद्धियों में तुम्हारी सिद्धि ही सर्वश्रेष्ठ है तथा कर्मो में तेरा कर्म प्रधान है।
32हे प्रभु ! सभी आज्ञाओं में तेरी आज्ञा ही सर्वोपरि है और सभी हुक्मों में तेरा हुक्म सबसे ऊपर अग्रणी है॥ ७॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं