गुरु ग्रंथ साहिब 506 · Raag Gujri · Guru Nanak Dev Ji
1हे हरि ! मेरा यह शरीर तेरी शरण में है और तेरा पवित्र पावन नाम मेरे हृदय में बसता है॥ ७ ॥
2हरि-नाम की पूँजी मन में आने से लोभ-लालच की लहरें नाश हो जाती हैं।
3गुरु नानक का कथन है कि हे निरंजन प्रभु ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, तू ही मेरे मन को वशीभूत कर दे॥ ८॥ १॥ ५॥
4गूजरी महला ३ घरु १
5ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
6मैं नृत्य करता हूँ परन्तु अपने इस मन को नचाता हूँ।
7गुरु की कृपा से मैंने अपना अहंकार मिटा दिया है।
8जो अपने मन को हरि-चरणों में स्थिर रखता है, उसकी मुक्ति हो जाती है तथा जैसी इच्छा करता है, वैसा ही मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है॥ १॥
9हे मन ! अपने गुरु के समक्ष श्रद्धा से नृत्य कर।
10यदि तुम गुरु की रज़ा अनुसार नृत्य करो तो तुझे सुख की प्राप्ति होगी और अन्तिम समय मृत्यु का भय भी तुझ से भाग जाएगा॥ रहाउ॥
11जिसे प्रभु स्वयं नचाता है, वही भक्त कहलवाता है। अपने प्रेम से प्रभु उसे स्वयं ही अपने चरणों में शरण देता है।
12ईश्वर स्वयं ही गाता है और स्वयं ही सुनाता है तथा अन्धे ज्ञानहीन मन को सन्मार्ग पर लगाता है॥ २॥
13जो दिन-रात नृत्य करता है और माया शक्ति पर अंकुश लगा देता है, वह प्रभु के मन्दिर में प्रविष्ट हो जाता है, जहाँ मोह-माया की निद्रा नहीं होती।
14माया के घर में सोया हुआ जगत नाचता-टापता एवं द्वैतवाद को गाता है। स्वेच्छाचारी पुरुष प्रभु-भक्ति नहीं कर सकता ॥ ३॥
15देवते, मनुष्य, विरक्त, कर्मकाण्डी, मुनिजन, ज्ञानी तथा चिंतक भी ईश्वर की कृपा से नृत्य करते हैं।
16सिद्ध, साधक पुरुष गुरु की शरणागत उत्तम बुद्धि प्राप्त करके विचारवान बन जाते हैं तथा प्रभु में सुरति लगाकर नृत्य करते हैं।॥ ४॥
17हे प्रभु ! खण्ड, ब्रह्माण्ड में रहने वाले त्रिगुणात्मक जीव जिन्होंने तेरे साथ ध्यान लगाया हुआ है, वे तेरी रज़ा में नृत्य कर रहे हैं।
18जीव-जन्तु एवं जीवन के चारों स्रोत प्रभु-इच्छा में नृत्य कर रहे हैं।॥ ५॥
19हे प्रभु ! जो तुझे अच्छे लगते हैं केवल वही नाचते हैं तथा जो गुरुमुख शब्द से ध्यान लगाते हैं, वह भी क्रियाशील हैं।
20जिन से प्रभु अपने हुक्म की पालना करवाता है वही भक्त एवं तत्व ज्ञानी है॥ ६॥
21यही भक्ति है कि मनुष्य प्रभु में ध्यान लगाए। सेवा के बिना भक्ति नहीं हो सकती।
22जब मनुष्य सांसारिक कार्य करता हुआ माया के मोह से मर जाए तो वह गुर-शब्द का चिन्तन करता है तथा तब वह सत्य को प्राप्त कर सकता है॥ ७॥
23धन-दौलत की प्राप्ति हेतु बहुत सारे लोग नाचते हैं। लेकिन कोई विरला पुरुष ही तत्व ज्ञान का बोध करता है।
24हे स्वामी ! जिस मनुष्य पर तुम कृपा-दृष्टि करते हो, वह गुरु की दया से तुझे पा लेता है॥ ८॥
25यदि मैं एक क्षण भर भी सत्य (परमात्मा) को विस्मृत करूँ तो वह समय व्यर्थ बीत जाता है।
26हे भाई ! प्रत्येक श्वास से तू सदा प्रभु को हृदय में धारण कर, वह अपनी इच्छानुसार तुझे स्वयं ही क्षमा कर देगा ॥९॥
27हे प्रभु ! केवल वही नाचते हैं जो तुझे अच्छे लगते हैं और जो गुरुमुख बनकर शब्द का चिन्तन करते हैं।
28नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जिन पर तुम्हारी दया-दृष्टि है, असल में वही सहजता से आत्मिक सुख की अनुभूति करते हैं।॥ १०॥ १॥ ६॥
29गूजरी महला ४ घरु २
30ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
31भगवान के बिना मेरा यह मन (जीवित) रह नहीं सकता, जैसे दूध के आधार पर रहने वाला बालक दूध के बिना नहीं रह सकता।
32अगम्य, अगोचर प्रभु गुरु के माध्यम से ही पाया जा सकता है। इसलिए मैं अपने सतिगुरु पर बलिहारी जाता हूँ॥ १॥
33हे मन ! हरि की यश-कीर्ति संसार-सागर से पार होने के लिए एक जहाज है।
34हे प्रभु ! जिन पर तुम्हारी कृपा-दृष्टि होती है, वह गुरु की शरण में नाम रूपी अमृत-जल को प्राप्त कर लेते हैं। रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं