गुरु ग्रंथ साहिब 504 · Raag Gujri · Guru Nanak Dev Ji
1उस ईश्वर ने ही पवन, पानी, अग्नि की रचना की है और ब्रह्म, विष्णु एवं महेश उसी की रचना हैं।
2हे प्रभु ! तू दाता हैं शेष सभी याचक हैं तथा अपनी रज़ा अनुसार यथायोग्य दान देता है॥ ४॥
3तेतीस करोड़ देवता भी उस नायक प्रभु से याचना करते हैं, जिसके भण्डार में दान की कोई कभी नहीं आती।
4उल्टे रखे बर्तन में कुछ भी डाला नहीं जा सकता और सीधे बर्तन में अमृत भरा दिखाई देता है॥ ५॥
5सिद्ध लोग अपनी समाधि में लीन होकर प्रभु से ऋद्धियों-सिद्धियों का दान माँगते हैं और उसकी जय-जयकार करते हैं।
6हे प्रभु ! मनुष्य के हृदय में जैसी प्यास होती है, वैसे ही प्रकार का जल तुम उसे देते हो॥ ६॥
7अहोभाग्य से ही अपने गुरु की सेवा होती है तथा गुरुदेव एवं प्रभु के बीच कोई भेद नहीं।
8जो प्राणी अपने अन्तर्मन में शब्द पर विचार करते हैं, उन्हें यमदूत की कुदृष्टि भी नाश नहीं कर सकती ॥ ७॥
9हे हरि ! मुझे अपने निरंजन नाम का प्रेम प्रदान करो, अब मैं तुझ से अन्य कुछ भी नहीं माँगता।
10नानक रूपी चातक तेरे अमृत जल की अभिलाषा करता है, कृपा करके उसे अपने हरियश का दान दीजिए॥ ८॥ २॥
11गूजरी महला १ ॥
12हे प्रिय ! जीव जन्मता-मरता और बार-बार जगत में आता-जाता रहता है। किन्तु गुरु के बिना किसी की गति नहीं होती।
13गुरुमुख व्यक्ति प्रभु-नाम में रंगे रहते हैं और नाम के माध्यम से ही वह गति एवं मान-सम्मान प्राप्त करते हैं। १ ॥
14हे भाई ! अपना चित्त राम-नाम के साथ लगाओ।
15नाम की ऐसी महिमा है कि मनुष्य गुरु की कृपा से केवल हरि-प्रभु को ही माँगता है॥ १॥ रहाउ ॥
16हे महोदय ! कितने ही लोग अपना पेट भरने के लिए भिक्षा मॉगने के लिए अनेक वेष धारण करते हैं।
17हे प्राणी ! हरि की भक्ति के बिना कहीं सुख नहीं और गुरु के बिना अभिमान दूर नहीं होता ॥ २॥
18हे जिज्ञासु ! काल सदा प्राणी के सिर पर खड़ा है और वह जन्म-जन्मांतरों से उसका वैरी है।
19सच्चे गुरु ने मुझे यह ज्ञान प्रदान किया है जो प्राणी सत्यनाम में लीन होते हैं, वे बच जाते हैं। ३॥
20गुरु की शरण में आने से यमदूत प्राणी को दु:खी नहीं कर सकता, अपितु उसकी ओर दृष्टि भी नहीं कर सकता।
21मैं अविगत एवं निरंजन नाथ में लीन हो गया हूँ और निर्भय प्रभु के साथ मैंने वृति लगा ली है॥ ४॥
22हे जीव ! प्रभु-नाम को अपने भीतर दृढ़ करो, नाम के साथ ही वृति लगाओ और सच्चे गुरु की शरण में आओ।
23जो कुछ परमात्मा को भला लगता है, वह वही करता है। उसके किए हुए को कोई भी मिटा नहीं सकता ॥ ५ ॥
24हे मेरे गुरुदेव ! मैं दौड़कर तेरी शरण में आ गया हूँ, क्योंकि किसी अन्य की शरण मुझे अच्छी नहीं लगती।
25मैं सदैव उस एक ईश्वर को ही पुकारता हूँ, जो युग-युग से मेरा सहायक है॥ ६॥
26हे प्रभु जी ! तुम अपने नाम की लाज रखना, तेरे साथ ही मेरी प्रीति बनी हुई है।
27हे गुरुदेव ! कृपा करके मुझे अपने दर्शन दीजिए क्योंकि नाम द्वारा मैंने अपना अहंकार जला दिया है॥ ७॥
28हे प्रभु जी ! मैं क्या माँगूं ? क्योंकि इस सृष्टि में सबकुछ नश्वर है। जो कोई भी इस दुनिया में आया है, वह चला जाता है।
29हे स्वामी ! नानक को नाम-पदार्थ प्रदान दीजिए, अपने हृदय एवं गले से इसे श्रृंगार बना कर स्मरण करूगा ॥ ८ ॥ ३॥
30गूजरी महला १ ॥
31हे प्रिय ! न हम उत्तम हैं, न ही नीच एवं न ही मध्यम श्रेणी के हैं। हम तो हरि की शरणागत, हरि के सेवक हैं।
32हम तो केवल हरि-नाम में लीन होने के कारण वैरागी हैं और हमने शोक, वियोग एवं रोग को विसर्जित कर दिया है॥ १॥
33हे भाई ! गुरु की कृपा से ही ठाकुर जी की भक्ति होती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं