गुरु ग्रंथ साहिब 503 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji
1साधु की संगति करने से हृदय कमल खिल गया है और खोटी बुद्धि त्याग दी है॥ २॥
2जो प्राणी आठों प्रहर हरि का गुणगान करता है और दीनदयालु का सिमरन करता है तो
3वह स्वयं भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है और संगति में आने वालों का भी उद्धार कर देता है तथा उनके समस्त बंधन कट जाते हैं। ३॥
4हे प्रभु स्वामी ! तेरे चरणों का ही मुझे आधार है। तू ताने-बाने की भाँति लोक-परलोक में सहायक है।
5हे प्रभु ! नानक ने तेरी शरण ली है, अपना हाथ देकर हरि ने उसे बचा लिया है॥ ४॥ २॥ ३२॥
6गूजरी असटपदीआ महला १ घरु १
7ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
8शरीर रूपी एक नगरी में काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार पाँच चोर निवास करते हैं। वर्जित करने पर भी वे शुभ गुणों को चोरी करने के लिए दौड़ते रहते हैं।
9हे नानक ! जो प्राणी तीन गुणों एवं दस इन्द्रियों से अपने आत्मिक गुणों का सामान बचाकर रखता है, वह मोक्ष पा लेता है॥ १॥
10हे भाई ! वासुदेव को हमेशा याद करो।
11राम को हृदय में बसाना ही जपमाला है॥ १॥ रहाउ॥
12जिसकी जड़ें ऊपर को हैं तथा शाखाएँ नीचे लटकती हैं और उसके पते चार वेद जुड़े हुए हैं,
13हे नानक ! जो जीव परब्रह्म की वृति में सावधान रहता है, वह सहज ही परब्रह्म रूपी पेड़ के पास पहुँच जाता है।॥ २॥
14भगवान रूपी पारिजात वृक्ष मेरे घर के आंगन में है तथा ज्ञान रूप इसके पुष्प, पते एवं टहनियों हैं।
15हे भाई ! उस स्वयंभू निरंजन परमात्मा की ज्योति सब में समाई हुई है, अतः दुनिया के जंजाल छोड़ दो॥ ३॥
16हे शिक्षा के अभिलाषी ! सुनो, नानक विनती करता है कि यह सांसारिक माया-जाल त्याग दो ।
17अपने मन में विचार कर ले कि एक ईश्वर से ध्यान लगाने से बार-बार के जन्म-मरण के चक्र में नहीं आना पड़ेगा ॥ ४॥
18वही गुरु कहलवाता है, वही शिष्य कहलवाता है और वही वैद्य है जो रोगी के रोग को जानकर उसका उपचार कर सके।
19वह सांसारिक काम-धंधे में लिप्त नहीं होता और गृहस्थी में ही कर्म करता हुआ प्रभु से जुड़ा रहता है॥ ५॥
20वह काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह एवं माया को त्याग देता है।
21अपने मन में वह सत्यस्वरूप एवं अविगत प्रभु का ध्यान करता है और गुरु की कृपा से उसे प्राप्त कर लेता है॥ ६ ॥
22ज्ञान-ध्यान समस्त देन ईश्वर द्वारा उसे मिली कही जाती है। सभी कामादिक विकार उसके समक्ष सतोगुणी हो जाते हैं।
23वह ब्रह्म रूपी कमल के शहद का पान करता है और सदैव जाग्रत रहता है तथा माया की निद्रा का शिकार नहीं होता। ७॥
24ब्रह्म रूपी कमल महा गंभीर है तथा इसके पते पाताल हैं। हे नानक ! वह सारी सृष्टि से जुड़ा हुआ है।
25गुरु के उपदेश के फलस्वरूप मैं पुनः गर्भ में प्रवेश नहीं करूँगा, क्योंकि मैंने सांसारिक विष को त्याग कर नामामृत का पान किया है॥ ८ ॥ १॥
26गूजरी महला १ ॥
27उस दाता प्रभु के समक्ष कौन-कौन मॉगते हैं ? उनका कोई अंत नहीं एवं उनकी गिनती नहीं की जा सकती।
28जैसी लालसा किसी के हृदय में होती है, हे सत्यस्वरूप प्रभु ! तू वैसे ही देने में समर्थ है॥ १॥
29हे प्रभु जी ! तेरे सत्यनाम का आधार ही मेरा जप, तपस्या एवं संयम है।
30मुझे अपना हरि-हरि नाम प्रदान करो चूंकि मैं सुख प्राप्त कर लूं। तेरी भक्ति के भण्डार भरे हुए हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
31तू शून्य समाधि लगाकर अपनी वृति में लीन रहता था।
32जब करतार ने खुद ही अपने स्वरूप की रचना की थी तो तब न जल था, न थल था, न धरती थी और न ही गगन था॥ २ ॥
33तब न माया की मस्ती, न ही अज्ञानता की छाया, न सूर्य और न ही चन्द्रमा था और तब परमात्मा की अपार ज्योति ही थी।
34सबको देखने वाली ऑखें परमात्मा के हृदय में ही हैं। वह अपनी एक कृपा-दृष्टि से ही पाताल, पृथ्वी एवं आकाश-तीनों लोकों की संभाल करता है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं