सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 500 · Raag Gujri

1गूजरी महला ५ ॥

2हे परमेश्वर ! कृपा करके मुझे अपने दर्शन दीजिए, मैं दिन-रात तेरा ही यशोगान करता रहूँ।

3अपने केशों से मैं तेरे सेवकों के चरण साफ करूँ अर्थात् उनकी सेवा करता रहूँ, यही मेरे जीवन का मनोरथ है॥ १॥

4हे ठाकुर ! तेरे बिना अन्य दूसरा कोई मेरा नहीं।

5हे हरि ! मैं अपने चित्त में तुझे ही याद करता हूँ एवं अपनी जिव्हा से तेरी ही आराधना करता हूँ तथा अपने नेत्रों से मैं तुझे ही देखता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

6हे दयालु अकालपुरुष ! तुम सभी के ठाकुर हो और हाथ जोड़ कर मैं तेरे समक्ष विनती करता हूँ।

7तेरा दास नानक तेरे नाम का जाप करता रहे और पलक झपकने मात्र के समय में उसका उद्धार हो जाए॥ २ ॥ ११ ॥ २० ॥

8गूजरी महला ५ ॥

9माया ब्रह्मलोक, रुद्रलोक और इन्द्रलोक को प्रभावित करती हुई (इहलोक में) दौड़ी आई है।

10परन्तु यह साधु की संगति को स्पर्श तक नहीं कर सकती एवं साधुओं के चरणों को मल-मल कर भलीभांति धोती है॥ १॥

11अब मैं गुरु की शरण में आ गया हूँ।

12सतगुरु ने मुझे यह बता दिया है कि माया की इस गुप्त अग्नि ने अनेकों को बुरी तरह जला दिया है॥ १॥ रहाउ॥

13यह प्रचंड माया सिद्ध, साधक, यक्ष, किन्नर तथा मनुष्यों के गले से लिपटकर उलझी हुई है।

14हे नानक ! उस जगत-रचयिता ने मेरा ही पक्ष लिया है, जिस प्रभु की करोड़ों ही ऐसी दासियाँ हैं।॥ २॥ १२॥ २१॥

15गूजरी महला ५ ॥

16भगवान का सिमरन करने से अपयश मिट जाता है, जगत में कीर्ति हो जाती है तथा सत्य के दरबार में मान-सम्मान प्राप्त हो जाता है।

17मृत्यु का भय क्षण में नाश हो जाता है और मनुष्य सुख एवं आनंद से सच्चे घर को जाता है।॥ १॥

18इसलिए उसकी नाम-सिमरन की सेवा व्यर्थ नहीं जाती।

19आठों प्रहर अपने प्रभु का सुमिरन करो और अपने मन एवं तन से सदैव उसका ध्यान करो।॥ १॥ रहाउ॥

20हे दीनों के दु:ख भंजक ! मैं तेरी शरण में आया हूँ और मैं केवल वही प्राप्त करता हूँ जो तू मुझे देता है।

21तेरे चरण-कमल की प्रीति से नानक अनुरक्त हो गया है। हे हरि ! तू ही अपने सेवकों की लाज रखता है॥ २॥ १३॥ २२ ॥

22गूजरी महला ५ ॥

23ईश्वर सब जीवों का दाता है और उसकी भक्ति के भण्डार भरे हुए हैं।

24उसकी सेवा-भक्ति कभी निष्फल नहीं होती और एक क्षण में ही वह जीव का उद्धार कर देता है॥ १॥

25हे मन ! तू प्रभु के चरण-कमल के संग लीन रह।

26समस्त जीव उसकी ही आराधना करते हैं, तू उससे ही याचना कर॥ १॥ रहाउ ॥

27हे सृष्टिकर्ता ! नानक तुम्हारी शरण में आया है। हे प्रभु ! इसलिए तू मेरे प्राणों का आधार है।

28संसार उसका क्या बिगाड़ सकता है, जिसकी तू सहायक बन कर स्वयं रक्षा करता है ॥ २ ॥ १४॥ २३ ।।

29गूजरी महला ५ ॥

30प्रभु ने स्वयं अपने सेवक की लाज रखी है।

31गुरु ने हरि-नाम की ओषधि प्रदान की है और सारा ताप दूर हो गया है॥ १॥

32परमेश्वर ने अपनी कृपा धारण करके हरिगोविन्द (छठी पातशाही) की रक्षा की है।

33उसकी सारी व्याधि मिट गई है और सर्व सुख हो गया। हम सदैव हरि के गुणों का चिंतन करते रहते हैं।॥ १॥

34यह पूर्णगुरु की बड़ाई है कि मेरे सृजनहार प्रभु ने हमारी प्रार्थना स्वीकार की है।

35गुरु नानक देव ने धर्म की अटल नींव रखी है, जो नित्य ही प्रगति कर रहा है॥ २ ॥ १५ ॥ २४ ॥

36गूजरी महला ५ ॥

37हे मानव ! तूने कभी भी भगवान के साथ अपना चित्त नहीं लगाया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं