गुरु ग्रंथ साहिब 49 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji
1संतों की संगति द्वारा क्षमावान प्रियतम प्रभु ह्रदय में बसता है।
2जिसने अपने प्रभु नाम का सिमरन किया है। वह राजाओं का भी राजा है॥ २॥
3जिस समय हरि नाम के यश व गुणों का चिन्तन किया जाए, वह करोड़ों तीर्थों के स्नान के पुण्य-फल के समान है।
4हरि स्मरण द्वारा रसना (जीभ) गुणों वाली हो जाती है, पुनः उसके तुल्य कोई दान नहीं है।
5अकालपुरुष दयालु एवं मेहरबान है, वह अपनी कृपा-दृष्टि द्वारा जीव के मन व तन में विराजमान होता है।
6जीव को तन एवं धन उस परमात्मा का दिया हुआ है, मैं उस पर सदैव ही न्यौछावर हूँ॥ ३॥
7जिसे कर्ता-पुरुष परमात्मा अपने साथ मिला ले, वह परमात्मा से मिला ही रहता है फिर कभी नहीं बिछुड़ता।
8सृजनहार प्रभु ने अपने सेवकों के माया रूपी बंधनों को काट दिया है।
9अपने सेवकों के गुणों-अवगुणों का विचार किए बिना भूले हुए को भी भक्ति-मार्ग पर डाल देता है।
10नानक कथन करते हैं कि उस भगवान की शरण में पड़ जा, जो समस्त जीवों का आधार है॥ ४ ॥ १८ ॥ ८८ ॥
11श्रीरागु महला ५ ॥
12यदि सत्य परमात्मा को रसना द्वारा स्मरण किया जाए तो जीव का मन एवं तन दोनों पवित्र हो जाते हैं।
13जीव के माता-पिता एवं अन्य सगे-संबंधी तो बहुत होते हैं किन्तु इहलोक एवं परलोक में उस परमात्मा के सिवाय अन्य कोई सहायक नहीं है।
14परमात्मा यदि अपनी कृपा-दृष्टि करे तो मनुष्य उसको क्षण-मात्र के लिए भी विस्मृत नहीं करता ॥ १॥
15हे मेरे मन ! जब तक तेरे प्राण हैं, उस सत्य परमात्मा का सिमरन करता जा।
16उस परमात्मा के अलावा समस्त सृष्टि मिथ्या है और अंत में नाश हो जाने वाली हैII१II रहाउ II
17मेरा परमात्मा बड़ा निर्मल है। उसके बिना मैं कभी नहीं रह सकता।
18मेरे मन एवं तन के भीतर परमेश्वर हेतु परम तृष्णा है। कोई भी आकर उससे मुझे मिला दे।
19मैंने चारों दिशाओं में उसकी खोज कर ली है, परम-पिता परमेश्वर के बिना अन्य कोई भी विश्राम स्थल नहीं ॥ २॥
20उस गुरु के समक्ष प्रार्थना कर, जो तुझे इस सृष्टि के सृजनहार से तेरा मिलाप करवा दे।
21सतिगुरु जी नाम के दाता हैं, जिनके पास भक्ति का पूर्ण भंडार है।
22सदैव उस प्रभु की प्रशंसा करो, जिसकी सीमा को अंत तक नहीं जाना जा सकता ॥३॥
23उस पालनहार परमात्मा की सराहना करो, जिसके अनेक कौतुक (लीला) हैं।
24विशेष बुद्धिमत्ता यही है कि उस परमात्मा की हमेशा आराधना करनी चाहिए।
25हे नानक ! परमात्मा का नाम उसी जीव के मन एवं तन को मीठा लगता है, जिसके मस्तक पर शुभ-कर्मों के भाग्य लिखे हुए हैं। ॥४॥१९ ॥८९ ॥
26श्रीरागु महला ५ ॥
27हे भाईयो ! संतजनों की संगति करके सत्यनाम की आराधना करो।
28जीवन के सफर में रास्ते का नाम रूपी भोजन बुद्धि रूपी दामन के साथ बांध लो, जो इहलोक एवं परलोक में तेरा सहायक होगा।
29यदि स्वामी अपनी कृपा करे तो यह भोजन गुरु की संगति से प्राप्त कर सकते हो।
30जिस पर ईश्वर कृपालु हो जाता है, उसे नाम रूपी भोजन शुभ कर्मों द्वारा मिल जाता है॥ १॥
31हे मेरे मन ! गुरु जैसा अन्य कोई (महान्) नहीं।
32मैं किसी अन्य स्थान का ख्याल नहीं कर सकता। केवल गुरु ही मुझे सत्य परमेश्वर से मिला सकता है।॥१॥ रहाउ॥
33जो प्राणी गुरु जी के दर्शन करता है, उसको संसार के समस्त पदार्थ (धन-दौलत,ऐश्वर्य) प्राप्त हो जाते हैं।
34हे मेरी माता ! वह प्राणी बड़े सौभाग्यशाली हैं, जिनका मन गुरु-चरणों में लीन हो जाता है।
35गुरु जी दानशील हैं, गुरु जी सर्वशक्तिमान, गुरु ही ईश्वर रूप सभी के भीतर विद्यमान हैं।
36गुरु ही परमेश्वर एवं पारब्रह्म हैं। गुरु जी ही डूबते हुओं को पार लगाने वाले हैं जो प्राणियों को जीवन-मृत्यु रूपी सागर से पार करवाते हैं॥२॥
37किस मुख से गुरु की प्रशंसा करूँ, जो करने एवं करवाने में समर्थ हैं।
38वे मस्तक (व्यक्ति) सदैव स्थिर रहते हैं, जिन पर गुरु ने अपना अनुकंपा का हाथ रखा है।
39गुरु ने मुझे जन्म-मरण का भय नाश करने वाला अमृत नाम पान करवाया है।
40मैंने गुरु परमेश्वर की भरपूर सेवा का फल प्राप्त किया है, जिसने सब भय-भंजन एवं मेरे दुखों को निवृत्त कर दिया है॥३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं