सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 499 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji

1यह बलवान माया सभी के भीतर वास कर रही है।

2उसका मर्म (भेद) गुरु की कृपा से ही पाया जाता है, दूसरा कोई भी इसे नहीं जानता ॥ १॥ रहाउ॥

3यह प्रबल माया सदैव से सभी स्थान विजय करती आ रही है तथा वह समूचे जगत से लिपटी हुई है।

4हे नानक ! परन्तु वह प्रबल माया साधु के पास से दूर भाग गई है और दासी बनकर उसने साधु के चरण पकड़ लिए हैं।॥ २॥ ५॥ १४॥

5गूजरी महला ५ ॥

6मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर विनती की और अपने ठाकुर जी का ध्यान किया है।

7परमेश्वर ने अपना हाथ देकर मेरी रक्षा की है तथा मेरे समस्त कष्ट मिटा दिए हैं।॥ १॥

8ठाकुर आप दयालु हुआ है।

9चारों ओर कल्याण एवं हर्षोल्लास हो गया है। उसने अपने बालकों (जीवों) का उद्धार कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥

10अपने वर (प्रभु-पति) से मिलकर नारी (जीव-स्त्री) मंगल गीत गा रही है और अपने ठाकुर का जय-जयकार कर रही है।

11हे नानक ! मैं उस गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, जिसने सबका उद्धार कर दिया है। २॥ ६ ॥ १५ ॥

12गूजरी महला ५ ॥

13इन्सान को अपने माता-पिता, भाई, पुत्र एवं संबंधियों का बल थोड़ा ही मिलता है।

14मैंने माया के अनेक रंग देखे हैं परन्तु अल्पमात्र कुछ भी इन्सान के साथ नहीं जाता ॥ १॥

15हे मेरे ठाकुर ! तुम्हारे बिना मेरा कोई भी नहीं है।

16मैं गुणहीन अनाथ हूँ, मुझ में कोई गुण मौजूद नहीं और मुझे तुम्हारा ही सहारा चाहिए॥ १॥ रहाउ॥

17मैं तेरे चरणों पर बार-बार बलिहारी एवं कुर्बान जाता हूँ। लोक-परलोक में तुम्हारा ही जोर है।

18हे नानक ! सत्संगति में मैंने प्रभु के दर्शन कर लिए हैं तथा दूसरों का अनुग्रह खत्म हो गया है॥ २॥ ७ ॥ १६ ॥

19गूजरी महला ५ ॥

20संत घर के जाल, भ्रम एवं मोह से मुक्त करा देता है और जीव का प्रभु से प्रेम डाल देता है।

21वह मन को यह उपदेश दृढ़ करता है कि सहज-सहज प्रभु का गुणगान करते रहोll १॥

22हे साजन ! संत जी ऐसे सहायक हैं कि

23जिनके दर्शन मात्र से ही माया के बन्धन कट जाते हैं और मनुष्य प्रभु को कदाचित विस्मृत नहीं करता ॥ १॥ रहाउ॥

24अनेक प्रकार के कर्म एवं विधियाँ करते हुए अंततः यही निष्कर्ष अच्छा लगा है कि

25हे नानक ! जो मनुष्य साधु से मिलकर हरि का यशगान पकड़ता है, यह भयसागर से पार हो जाता है। २॥ ८ ॥ १७ ॥

26गूजरी महला ५ ॥

27भगवान एक क्षण में ही पैदा करने तथा ध्वस्त (नाश) करने में सक्षम है। इसलिए उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

28एक क्षण में ही वह राजा को रंक बना देता है और नीच कहलवाने वालों के अन्तर में अपनी ज्योति प्रज्वलित कर देता है॥ १॥

29सदैव ही अपने हरि का ध्यान करना चाहिए।

30जिस जीवन में इन्सान ने एक घड़ी भर अर्थात् थोड़ी देर के लिए ही रहना है, उस बारे चिंता एवं फिक्र क्यों किया जाए॥ १॥ रहाउ॥

31हे मेरे पूर्ण सतगुरु ! हमें तुम्हारी ही टेक है और मेरे मन ने तेरी शरण ली है।

32हे नानक ! हम ज्ञानहीन एवं नासमझ बालक हैं, अपना हाथ देकर आप हमारी रक्षा कीजिए॥ २॥ ६ ॥ १८ ॥

33गूजरी महला ५ ॥

34हे परमात्मा ! तू सभी जीवों का दाता है, मेरे मन में भी आकर बस जाओ।

35जिस हृदय में तेरे सुन्दर कमल-चरण बस जाते हैं, वहाँ कोई भ्रम एवं अज्ञानता का अन्धेरा नहीं रहता ॥ १॥

36हे मेरे ठाकुर ! मैं जहाँ कहीं भी तुझे याद करता हूँ, वहाँ ही तुझे पाता हूँ।

37हे समस्त जीवों के पालनहार प्रभु ! मुझ पर कृपा करो चूंकि मैं सदैव ही तुम्हारा स्तुतिगान करता रहूँ॥ १॥ रहाउ ॥

38हे प्रभु ! मैं श्वास-श्वास से तुम्हारा नाम-स्मरण करता हूँ तथा सदैव तेरे मिलन की अभिलाषा करता हूँ।

39हे नानक ! मुझे केवल सृष्टिकर्ता प्रभु का ही सहारा है और मैंने अन्य समस्त पराई आशा त्याग दी है॥ २ ॥ १० ॥ १६ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं